Guerrilla VS Guerrilla in Bastar: स्थानीय DRG और बस्तर फाइटर्स ने नक्सलियों को घेर लिया, 31 मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले निर्णायक झटका

Guerrilla VS Guerrilla in Bastar: छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में चार दशक पुराने नक्सली (माओवादी) आंदोलन का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा है। जहां एक समय नक्सली जंगलों में गुरिल्ला युद्ध की मास्टर क्लास देते थे, वहीं अब बस्तर के अपने ही आदिवासी युवा – डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) और बस्तर फाइटर्स – उसी गुरिल्ला रणनीति से उन्हें घेर रहे हैं। एक अखबार में आज प्रकाशित लंबे रिपोर्ट में इस ‘गुरिल्ला बनाम गुरिल्ला’ की पूरी कहानी सामने आई है, जिसमें स्थानीय जानकारी, समर्पण और निडरता ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।

DRG और बस्तर फाइटर्स
2014-15 में बस्तर के आदिवासी युवाओं और सरेंडर किए नक्सलियों से DRG का गठन हुआ। 2022 में बस्तर फाइटर्स यूनिट बनी। ये दोनों यूनिटें अब बस्तर रेंज की 90% नक्सली मार और 70% गिरफ्तारियों के पीछे हैं। इनकी ताकत? घने साल, सागौन और बांस के जंगलों, खड़ी चट्टानों, सूखे नालों और स्थानीय बोली-भाषा की गहरी जानकारी। जबकि बाहरी फोर्सेज को रास्ता नहीं सूझता, DRG के जवान 45 किलोमीटर का सफर बिना रुके तय कर लेते हैं और 7 दिन तक लगातार ऑपरेशन चला सकते हैं। पूर्व नक्सली महिपाल अचला (जो कभी गणपति के बॉडीगार्ड थे) अब DRG कमांडर हैं। उन्होंने बताया, “हमने सीखा था कि दुश्मन मजबूत हो तो पीछे हटो और छिप जाओ। अब हम पूरा इलाका घेर लेते हैं, भागने नहीं देते और ट्रैक करके मारते हैं।” बस्तर फाइटर्स की दामिनी उईके (बकुलवाई गांव) और नयानकुमार कोडियाम (जिनके पिता को नक्सलियों ने मार डाला) जैसे युवा अब खुद नक्सलियों का पीछा करते हैं।

2024-25 के बड़े ऑपरेशन
• अप्रैल 2024, कोरचोली (बीजापुर): 13 नक्सली मारे गए – 2017 के बाद दंडकारण्य में सबसे बड़ा झटका।
• फरवरी 2025, इंद्रावती नेशनल पार्क: 31 नक्सली और 2 जवान शहीद।
• अप्रैल 2025, ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट (कारे गुट्टा पहाड़ियां): 31 नक्सली मारे गए – सबसे लंबी लड़ाई।
• मई 2025: नक्सली जनरल सेक्रेटरी नंबाला केशव राव (बासवा राजू) समेत 26 साथी ढेर। पिछले दो सालों में नक्सली मार औसत 48 प्रति वर्ष से बढ़कर 250 प्रति वर्ष हो गई है (400% उछाल)। नागरिक मौतें 74 से घटकर 56 और जवान शहीद 56 से घटकर 21 रह गई हैं। DRG के 82 जवान शहीद हुए, 18 के अंग कटे, लेकिन उनका मनोबल अटूट है। डेडलाइन से पहले तेज रफ्तार
गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 को पूरे देश को नक्सल मुक्त करने की डेडलाइन दी है।

फरवरी 2026 तक:
• इस साल अब तक 25+ नक्सली मारे गए (26 फरवरी को बीजापुर में 2 और ढेर, 10 लाख का इनाम)।
• जनवरी से अब तक 51 नक्सली सरेंडर (बीजापुर-सुकमा में बड़े इनाम वाले)।
• 2024 से कुल 2700+ सरेंडर, 532 नक्सली मारे गए।
• अबुझमाड़ क्षेत्र पर सुरक्षा बलों का 80% कंट्रोल, दो बस्तर जिले LWE-फ्री होने की राह पर। अभी हाल ही में 120 पूर्व नक्सली छत्तीसगढ़ विधानसभा पहुंचे और सदन की कार्यवाही देखी – यह राज्य के लिए ऐतिहासिक क्षण था।

रणनीति का बदलाव
नक्सली हमला करते थे जब जवान थक जाते। DRG ने उल्टा रणनीति अपनाई – सूचना मिलते ही घेराबंदी, पीछा और सरेंडर का दबाव। पूर्व नक्सलियों से मिली जानकारी, ग्रे हाउंड्स (आंध्र प्रदेश) के साथ ट्रेनिंग और सिविलियन आउटरीच ने काम किया। मोर्चे पर बलिदान, लेकिन उम्मीद
DRG जवान मोहन बड्डी (दिसंबर 2025 में शहीद) का सपना था कि परिवार को पक्का घर मिले। उनकी बहन रवनम्मा कहती हैं, “सरकारी नौकरी मिली तो जीवन सुधरेगा सोचा, लेकिन…” फिर भी परिवार गर्व करता है। ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जिन्होंने नक्सलियों के हाथों रिश्तेदार खोए, लेकिन अब बस्तर बदल रहा है।

नक्सलवाद के बाद का बस्तर
विश्नु देव साय सरकार के 2026-27 बजट में अबुझमाड़ और जगर्गुंडा को ‘आधुनिक शिक्षा शहर’ बनाने के लिए 100 करोड़ रुपये। इंद्रावती नदी पर दो बैराज (2024 करोड़) से 32,000 हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई। 1500 नए बस्तर फाइटर्स पद, PVTG के लिए 720 करोड़। गृह मंत्रालय और राज्य सरकार का फोकस अब ‘पोस्ट-नक्सल’ विकास पर है। निष्कर्ष
बस्तर के आदिवासी युवा आज न केवल अपनी मिट्टी बचा रहे हैं, बल्कि देश को नक्सल मुक्त कराने का सबसे बड़ा हथियार बन गए हैं। अमित शाह का वादा पूरा होने वाला है। अखबार के ग्राउंड रिपोर्ट और ताजा आंकड़ों से साफ है – बस्तर अब नक्सलियों का नहीं, उसके अपने लोगों का है।

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