जिम्स ग्रेटर नोएडा: 16 दिन की हड़ताल खत्म, कर्मचारियों की वापसी से पटरी पर लौटीं स्वास्थ्य सेवाएं

डीएम के आश्वासन पर टूटा गतिरोध, जांच समिति गठित करने और नियमितीकरण पर शासन को भेजा जाएगा प्रस्ताव

कासना स्थित राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में करीब 700 आउटसोर्स कर्मचारियों की 16 दिनों से चल रही हड़ताल आखिरकार खत्म हो गई है। जिलाधिकारी मेधा रूपम के आश्वासन के बाद बुधवार, 1 जुलाई से सभी कर्मचारी अपने-अपने कार्यस्थलों पर लौट आए, जिससे अस्पताल की ठप पड़ी स्वास्थ्य सेवाएं फिर से सुचारु होने लगी हैं।

कैसे शुरू हुआ विवाद

नर्सिंग स्टाफ, क्लर्क, टेक्नीशियन और सफाईकर्मियों समेत गैर-शैक्षणिक आउटसोर्स कर्मचारी 15 जून से नियमितीकरण, वेतन वृद्धि और हाल में निकाली गई भर्ती रद्द करने की मांग को लेकर अस्पताल परिसर में धरने पर बैठ गए थे। कर्मचारियों का आरोप था कि वर्षों से सेवाएं देने के बावजूद उन्हें स्थायी नहीं किया जा रहा। जिम्स निदेशक डॉ. (ब्रिगेडियर) राकेश गुप्ता की ओर से बताया गया कि कर्मचारी बिना किसी परीक्षा के सीधे नियमितीकरण की मांग कर रहे थे।

मरीजों पर पड़ी भारी मार

हड़ताल के दौरान अस्पताल की सामान्य सेवाएं लगभग ठप हो गईं। रिपोर्टों के अनुसार 10 हजार से अधिक मरीजों को बिना इलाज के वापस लौटना पड़ा और करीब 300 निर्धारित सर्जरी टालनी पड़ीं। हड़ताल से पहले ओपीडी में रोजाना जितने मरीज पहुंचते थे, उनकी संख्या हड़ताल के दौरान बेहद कम रह गई, हालांकि एक दिन सबसे अधिक मरीज भी पहुंचे। ऑपरेशन थिएटर और सिजेरियन डिलिवरी जैसी सेवाएं ठप रहीं, और केवल इमरजेंसी व पुराने भर्ती मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर इलाज मिल पाया। मजबूरन कई मरीजों को नोएडा जिला अस्पताल और निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ा।

24-25 जून: गतिरोध और बल प्रयोग

हड़ताल के दौरान प्रशासन और कर्मचारियों के बीच कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही। 24 जून को करीब पांच घंटे चली वार्ता भी विफल रही और देर रात विवाद और गहरा गया, जिसके बाद पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके अगले सप्ताह, 25 जून की रात पुलिस ने बल प्रयोग कर धरनास्थल खाली कराया, जिसमें कई कर्मचारी घायल हो गए। कर्मचारियों ने लाठीचार्ज का आरोप लगाया, जबकि पुलिस प्रवक्ता ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि हटाए जाने के दौरान बाहरी लोगों ने धक्का-मुक्की की थी।

डीएम की मध्यस्थता से निकला हल

तनाव बढ़ने पर जिला प्रशासन ने सक्रिय भूमिका निभाई। जिम्स निदेशक 25 जून से लगातार वीडियो संदेश जारी कर कर्मचारियों से ड्यूटी पर लौटने की अपील कर रहे थे। 30 जून (मंगलवार) को डीएम मेधा रूपम और निदेशक की मौजूदगी में हड़ताली कर्मचारियों के साथ अहम बैठक हुई, जिसमें उनकी मांगों को गंभीरता से सुना गया। इसी बैठक में तय हुआ कि: कर्मचारियों पर हड़ताल के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की कार्रवाई शुरू की जाएगी, लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए जिम्स और कर्मचारी प्रतिनिधियों की एक समिति बनाई जाएगी, जिसका नेतृत्व जिला प्रशासन के अधिकारी करेंगे, सिविल अनुबंधों से जुड़ी मांगों पर नीति-बदलाव के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा, नियमित पदों में कोटा देने की मांग को लेकर भी शासन स्तर पर प्रस्ताव भेजा जाएगा, डीएम मेधा रूपम ने कहा कि कर्मचारियों की मांगों को शासन तक पहुंचाया जाएगा और जो भी स्थानीय स्तर पर संभव था, उसे तुरंत पूरा कराने का भरोसा दिलाया गया है।

बुधवार से लौटी रौनक

आश्वासन मिलने के बाद बुधवार, 1 जुलाई से सभी कर्मचारी ड्यूटी पर लौट आए। इससे अस्पताल का माहौल सामान्य होने लगा और रुकी हुई चिकित्सा सेवाएं फिर से गति पकड़ने लगीं। कर्मचारियों ने कहा कि मरीजों की सेवा उनकी प्राथमिकता है और वे पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे। जिम्स निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता ने भरोसा जताया कि कर्मचारियों की वापसी से रुके हुए काम फिर से पटरी पर आ जाएंगे और शासन स्तर पर जो भी संभव कदम होंगे, वे सुनिश्चित कराए जाएंगे। करीब दो हफ्ते तक चली इस हड़ताल ने न सिर्फ हजारों मरीजों की परेशानी बढ़ाई, बल्कि अस्पताल प्रशासन और पुलिस के बीच तनाव के भी कई पल पैदा किए। अब देखना यह होगा कि शासन को भेजे गए प्रस्तावों पर आगे क्या फैसला होता है और जांच समिति की रिपोर्ट में क्या सामने आता है।

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