रेत, कीकर और पगडंडियों से ₹1 लाख करोड़ के निवेश हब तक — नोएडा के 50 साल

नोएडा। जहाँ आज ऊँची-ऊँची इमारतें, आईटी पार्क और औद्योगिक सेक्टर हैं, वहाँ पाँच दशक पहले यमुना और हिंडन नदियों के बीच केवल रेत उड़ाती पगडंडियाँ थीं, कीकर के पेड़ थे और किसानों के खेत-खलिहान थे। 17 अप्रैल 1976 को उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बंजर भूखंड पर एक औद्योगिक शहर की नींव रखी। तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि इस माटी में निवेश की इतनी उर्वरता छिपी है।

शुक्रवार 18 अप्रैल को नोएडा अपने 51वें वर्ष में कदम रखेगा। पाँच दशकों में यह शहर न केवल यूपी का शो विंडो बन चुका है, बल्कि आज देश-दुनिया के निवेशक यहाँ अपनी तिजोरियाँ खोलने को तत्पर हैं। “मौजूदा वक्त में नोएडा में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है और यह आँकड़ा लगातार बढ़ रहा है।”

औद्योगिक से आईटी हब तक का सफर

पहले चरण में नोएडा ने मैन्युफैक्चरिंग और औद्योगिक इकाइयों के रूप में पहचान बनाई। अब शहर तेजी से एक प्रमुख आईटी हब के रूप में उभर रहा है। देश के दूसरे राज्यों के साथ-साथ विदेशी कंपनियाँ भी यहाँ सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और रिसर्च सेंटर स्थापित कर रही हैं। पहले से स्थापित कंपनियाँ अपनी क्षमता का विस्तार कर रही हैं, जिससे शहर में रोजगार के नए अवसर निरंतर पैदा हो रहे हैं।

ये दिग्गज कंपनियाँ हैं नोएडा में
एचसीएल टेक्नोलॉजी, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, एडोबी, माइक्रोसॉफ्ट, एडवर्ष, एमएक्यू सॉफ्टवेयर, सिफी, अडानी एंटरप्राइजेज, इंफोसिसटेक महिंद्रा आदि है। उसके अलावा मीड सेगमेंट की काफी कंपनियां है। सेमसंग जैसी मोबाइल बनाने की कंपनियां भी नोएडा से ही उत्पादन कर रही है। इन कंपनियों ने नोएडा में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और कॉर्पोरेट ऑफिस स्थापित किए हैं। इनके अलावा भी सैकड़ों छोटी-बड़ी कंपनियाँ यहाँ काम कर रही हैं।
रोजगार की नई राहें

कंपनियों के निरंतर आगमन और विस्तार से नोएडा युवाओं के लिए रोजगार का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, मीडिया और सेवा क्षेत्र में हर वर्ष हजारों नए पद सृजित हो रहे हैं। दिल्ली से सटे होने का भौगोलिक लाभ इस शहर को पूरे एनसीआर में विशेष स्थान दिलाता है।

आगे की राह

51वें वर्ष में प्रवेश के साथ नोएडा के सामने अवसरों की कोई कमी नहीं है। डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएँ खुल रही हैं। 50 साल पहले जिस जमीन पर किसान हल चलाते थे, आज वहाँ देश के भविष्य को आकार देने वाली तकनीक की खेती हो रही है।

 

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