गौतमबुद्ध नगर में किसानों का आंदोलन बनाम जनप्रतिनिधियों के दावे: मुआवजा बढ़ा, फिर भी क्यों नहीं थम रहा विरोध?

ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध नगर में जमीन, मुआवजा, आबादी और विकसित भूखंडों से जुड़े मुद्दे एक बार फिर किसानों के आंदोलन के केंद्र में हैं। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण से जुड़े क्षेत्रों में किसान अलग-अलग मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर, जनप्रतिनिधियों की ओर से किसानों के हित में फैसले कराने और शासन स्तर पर समस्याएं उठाने के दावे भी लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर किसानों के पक्ष में कई फैसले हुए हैं तो फिर आंदोलन खत्म क्यों नहीं हो रहा?

हाल के दिनों में नोएडा प्राधिकरण की ओर से किसानों के मुआवजे में 53 प्रतिशत तक बढ़ोतरी से जुड़ा फैसला सामने आया है। रिपोर्टों के मुताबिक न्यू नोएडा के फेज-1 और फेज-2 में किसानों को ग्रेटर नोएडा के बराबर मुआवजा और 6 प्रतिशत आबादी प्लॉट, जबकि फेज-3 और फेज-4 में यमुना प्राधिकरण के बराबर मुआवजा और 7 प्रतिशत प्लॉट देने का निर्णय बताया गया है।

इसके बावजूद यह फैसला पूरे किसान आंदोलन को खत्म नहीं कर पाया है। इसकी एक वजह यह है कि गौतमबुद्ध नगर के तीनों प्राधिकरणों में किसानों की मांगें एक जैसी नहीं हैं। किसी क्षेत्र में मुआवजे की दर मुख्य मुद्दा है तो कहीं 10 प्रतिशत विकसित भूखंड, आबादी के निस्तारण, पुराने अधिग्रहण से जुड़े लाभ और लंबित मामलों का समाधान प्रमुख मांग है।

पंकज सिंह की पहल से नोएडा किसानों के मुआवजे में बड़ा फैसला

नोएडा क्षेत्र में किसानों के मुआवजे को लेकर विधायक पंकज सिंह की भूमिका लगातार चर्चा में रही है। हालिया रिपोर्टों में नोएडा प्राधिकरण की बोर्ड बैठक के बाद किसानों के मुआवजे में 53 प्रतिशत वृद्धि और अलग-अलग फेज में प्लॉट संबंधी प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।

पंकज सिंह की ओर से भी किसानों के लिए इस फैसले को महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके कार्यालय से जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट में मुआवजा बढ़ाने की पहल को किसानों के लिए सकारात्मक बताया गया है।

लेकिन यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी नीति या मुआवजे की घोषणा और प्रत्येक प्रभावित किसान के मामले का वास्तविक निस्तारण दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। किसान आंदोलन का जारी रहना इस बात का संकेत है कि सभी लंबित मुद्दों का समाधान एक साथ नहीं हुआ है।

ग्रेटर नोएडा में 6 प्रतिशत का फैसला, फिर 10 प्रतिशत की मांग क्यों?

ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में भी किसानों के लिए मुआवजे की दर में बड़ा बदलाव हुआ है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार भूमि अधिग्रहण की दर 4,125 रुपये से बढ़ाकर 6,415 रुपये प्रति वर्गमीटर किए जाने और 6 प्रतिशत आबादी प्लॉट बहाल किए जाने की जानकारी सामने आई है।

लेकिन वर्तमान आंदोलन में किसान संगठनों की ओर से 10 प्रतिशत विकसित भूखंड और 64.7 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजे जैसी मांगें प्रमुखता से उठाई जा रही हैं। हालिया प्रदर्शनों और किसान संगठनों के बयानों में इन मांगों का उल्लेख हुआ है।

यही वह बिंदु है जहां सरकारी फैसले और किसानों की अपेक्षाओं के बीच अंतर दिखाई देता है। प्राधिकरण की ओर से 6 प्रतिशत आबादी प्लॉट और नई मुआवजा दर का फैसला हो चुका है, लेकिन आंदोलनकारी किसान इससे आगे की मांगों पर कायम हैं।

जेवर में धीरेंद्र सिंह की सक्रियता, लेकिन सवाल अभी बाकी

जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह भी एयरपोर्ट और भूमि अधिग्रहण से जुड़े किसानों के मुद्दे लगातार उठाते रहे हैं। उनके सार्वजनिक बयानों और सोशल मीडिया गतिविधियों में किसानों की समस्याओं को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचाने और उनके साथ संवाद कराने की जानकारी मिलती है।

जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी बड़ी परियोजना के लिए जमीन देने वाले किसानों के लिए मुआवजा, पुनर्वास और भविष्य के अवसर महत्वपूर्ण विषय हैं। विधायक की ओर से किसानों और मुख्यमंत्री के बीच संवाद को समाधान की दिशा में कदम के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लेकिन किसानों की संतुष्टि का अंतिम पैमाना बैठक या घोषणा नहीं बल्कि लंबित मांगों का धरातल पर निस्तारण है। यही वजह है कि जनप्रतिनिधियों की सक्रियता के बावजूद किसान संगठनों का आंदोलन अलग-अलग स्तर पर जारी दिखाई दे रहा है।

दादरी विधायक तेजपाल नागर भी किसानों के मुद्दे उठाने का दावा करते हैं

दादरी क्षेत्र में विधायक तेजपाल नागर की ओर से भी किसानों से जुड़े मुद्दों को शासन और प्राधिकरण के सामने रखने के दावे किए जाते रहे हैं। किसान मुद्दों पर उनके साथ अन्य जनप्रतिनिधियों की भागीदारी से संबंधित सार्वजनिक पोस्ट भी सामने आए हैं।

लेकिन तीनों प्राधिकरण क्षेत्रों की समस्या की जटिलता यह है कि एक विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र के मुद्दे को उठा सकता है, जबकि जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े अंतिम निर्णय प्राधिकरण, शासन और कई मामलों में न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े होते हैं। इसलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक निस्तारण के बीच समय का अंतर भी किसानों के असंतोष का एक कारण हो सकता है।

आखिर किसान संतुष्ट क्यों नहीं हैं?

किसानों के मौजूदा आंदोलन को देखें तो इसके पीछे केवल मुआवजे की दर नहीं है। अलग-अलग किसान संगठनों द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों में 64.7 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजा, 10 प्रतिशत विकसित भूखंड, आबादी से जुड़े मामलों का निस्तारण और पुराने लंबित मामलों का समाधान शामिल है। जुलाई 2026 में भी किसानों की महापंचायत से जुड़ी रिपोर्ट में 10 प्रतिशत विकसित भूखंड सहित कई मांगों का उल्लेख किया गया था।

यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में भी 64.7 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजे और 10 प्रतिशत विकसित भूखंड की मांग लंबे समय से आंदोलन का हिस्सा रही है। 2025 की रिपोर्टों में भी इन्हीं मांगों को लेकर बड़े किसान आंदोलन की तैयारी का उल्लेख किया गया था।

इससे यह तस्वीर सामने आती है कि एक मांग पर फैसला होने से किसानों की पूरी मांग खत्म नहीं होती। उदाहरण के लिए, मुआवजा बढ़ना एक मुद्दे का समाधान हो सकता है, लेकिन यदि किसी किसान का आबादी प्लॉट, विकसित भूखंड या अधिग्रहण से जुड़ा पुराना मामला लंबित है तो उसके लिए आंदोलन जारी रखने का कारण बना रह सकता है।

क्या जनप्रतिनिधि सिर्फ घोषणा कर रहे हैं?

इस सवाल का सीधा जवाब केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर देना उचित नहीं होगा। उपलब्ध सूचनाओं से इतना जरूर स्पष्ट है कि जनप्रतिनिधियों की ओर से किसानों के मुद्दे उठाए जाने और कुछ नीतिगत फैसलों में प्रगति के उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन दूसरी तरफ आंदोलन और लंबित मांगों की मौजूदगी भी वास्तविक है। नोएडा में मुआवजे में 53 प्रतिशत वृद्धि का फैसला और ग्रेटर नोएडा में 6,415 रुपये प्रति वर्गमीटर की नई दर इसके उदाहरण हैं।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जनप्रतिनिधि किसानों के साथ खड़े हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उनकी पहल से कितने मामलों का अंतिम और समयबद्ध निस्तारण हुआ? कितने किसानों को वास्तविक रूप से बढ़ा हुआ मुआवजा मिला? कितने लंबित आबादी मामलों का निपटारा हुआ? कितने पात्र किसानों को विकसित भूखंड मिले? और जिन मांगों पर अभी सहमति नहीं बनी है, उनके समाधान की समयसीमा क्या है?

सोशल मीडिया की उपलब्धि बनाम जमीन पर परिणाम

आज राजनीतिक और प्रशासनिक फैसलों की जानकारी सोशल मीडिया के जरिए तेजी से जनता तक पहुंचती है। इससे जनप्रतिनिधियों को अपनी पहल और उपलब्धियां बताने का अवसर मिलता है। लेकिन किसान आंदोलन यह भी दिखाता है कि सोशल मीडिया पर घोषणा और जमीन पर लाभ मिलने के बीच का अंतर खत्म करना जरूरी है।

यदि किसी किसान को वास्तव में संशोधित मुआवजा मिल जाता है, उसका आबादी संबंधी मामला निपट जाता है और पात्रता के अनुसार विकसित भूखंड भी मिल जाता है, तो उसका आंदोलन से अलग होना स्वाभाविक परिणाम हो सकता है। इसके उलट यदि घोषणा के बावजूद फाइलें लंबित रहती हैं या पात्रता को लेकर विवाद बना रहता है, तो असंतोष जारी रह सकता है।

तीनों प्राधिकरणों के लिए बड़ी चुनौती

गौतमबुद्ध नगर में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण की विकास परियोजनाओं ने जमीन की मांग बढ़ाई है। ऐसे में किसानों और प्राधिकरण के बीच विश्वास का सवाल केवल मुआवजे की राशि से हल नहीं होगा। स्पष्ट नीति, पारदर्शी पात्रता, समयबद्ध निस्तारण और फैसलों के वास्तविक क्रियान्वयन की जरूरत होगी।

मौजूदा परिस्थितियों में उपलब्ध तथ्यों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि जनप्रतिनिधि केवल दिखावा कर रहे हैं या पूरी तरह समाधान करा रहे हैं। दोनों पक्षों के दावों के बीच वास्तविक स्थिति जानने के लिए प्रत्येक मांग पर घोषणा, शासनादेश, प्राधिकरण का निर्णय और वास्तविक लाभार्थी तक भुगतान/प्लॉट आवंटन की स्थिति देखना जरूरी है। यही वह कसौटी होगी जिससे आने वाले समय में पता चलेगा कि किसानों की समस्याओं पर हुई राजनीतिक पहल वास्तव में कितनी दूर तक पहुंची और गौतमबुद्ध नगर के किसान आंदोलन का समाधान स्थायी रूप से कब हो पाता है।

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