ग्रेटर नोएडा/नोएडा। आवासीय सोसाइटियों में अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन यानी AOA का गठन निवासियों की सुविधा और सोसाइटी के सुचारु संचालन के लिए होता है — लेकिन नोएडा और ग्रेटर नोएडा की दर्जनों सोसाइटियों में यही AOA अब विवाद, गुटबाजी और अदालती लड़ाइयों का केंद्र बन चुकी है। ताजा मामला ग्रेटर नोएडा वेस्ट स्थित पंचशील हाइनिश सोसाइटी का है, जहां पिछले एक साल से चले आ रहे AOA चुनाव विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए डिप्टी रजिस्ट्रार गाजियाबाद और SDM दादरी के आदेशों को निरस्त कर दिया है और वर्तमान AOA को एक माह के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया है।
क्या है पंचशील हाइनिश का पूरा विवाद
ग्रेटर नोएडा वेस्ट की पंचशील हाइनिश सोसाइटी में AOA चुनाव को लेकर पिछले करीब एक वर्ष से घमासान मचा हुआ था। विरोधी गुट ने चुनाव प्रक्रिया को चुनौती देते हुए प्रशासनिक दरवाजे खटखटाए, जिसके बाद डिप्टी रजिस्ट्रार गाजियाबाद और एसडीएम दादरी ने अपने-अपने आदेश जारी किए। इन आदेशों के चलते सोसाइटी की चुनाव प्रक्रिया लंबे समय तक विभागीय पचड़े में उलझी रही। मामला अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां न्यायालय ने दोनों अधिकारियों के आदेशों को निरस्त करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया कि वर्ष 2025-26 की वर्तमान AOA एक माह के भीतर निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संपन्न कराए।
AOA अध्यक्ष विनोद नेगी और सचिव विजय मोहन रस्तोगी ने हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि विरोध के कारण सोसाइटी को पिछले एक वर्ष तक अनावश्यक रूप से विभागीय प्रक्रियाओं में उलझाए रखा गया। उन्होंने आश्वासन दिया कि माननीय हाईकोर्ट के आदेश का पूर्ण सम्मान करते हुए लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराए जाएंगे और नई कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा।
नोएडा-ग्रेटर नोएडा में AOA विवाद — एक व्यापक समस्या
पंचशील हाइनिश का यह मामला कोई अपवाद नहीं है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा की दर्जनों बड़ी आवासीय सोसाइटियों में AOA को लेकर विवाद चल रहे हैं और बड़ी संख्या में मामले अदालतों तक पहुंच चुके हैं। इन विवादों की जड़ें कई कारणों में हैं:
सत्ता और धन का खेल: AOA का पद संभालने वाले पदाधिकारियों के हाथ में सोसाइटी के रखरखाव फंड, मेंटेनेंस शुल्क और बड़े ठेकों का नियंत्रण होता है। कई सोसाइटियों में यह रकम करोड़ों रुपये तक पहुंचती है, जिस पर नियंत्रण के लिए गुटबाजी होती है।
चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव: मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव की तारीख तय करने तक हर कदम पर विवाद उठता है। कौन मतदान करेगा, कौन प्रत्याशी बन सकता है — इन बुनियादी सवालों पर भी सहमति नहीं बन पाती।
कानूनी उलझन: उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट (प्रोन्नयन, निर्माण एवं अनुरक्षण) अधिनियम के तहत AOA के गठन और संचालन के नियम तो हैं, लेकिन उनकी व्याख्या को लेकर हमेशा मतभेद रहते हैं।
नोएडा की प्रमुख सोसाइटियों में भी चल रहे हैं विवाद
नोएडा में भी कई नामी सोसाइटियों में AOA विवाद सुर्खियों में रहे हैं। सेक्टर-74, 75, 76, 78 और 137 जैसे इलाकों की बड़ी सोसाइटियों में चुनाव विवाद, फंड के दुरुपयोग के आरोप और पदाधिकारियों को हटाने की मांग को लेकर निवासी आपस में उलझते रहे हैं। कई सोसाइटियों में तो एक साथ दो-दो समानांतर AOA काम करने का दावा करती रही हैं, जिससे निवासी यह भी तय नहीं कर पाते कि मेंटेनेंस किसे दें और शिकायत किसके पास करें।
AOA विवाद के सामान्य कारण — जो हर सोसाइटी में दोहराते हैं
विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर AOA विवादों के पीछे कुछ साझा कारण सामने आते हैं:
- मेंटेनेंस फंड में अनियमितता: करोड़ों रुपये के फंड का हिसाब-किताब पारदर्शी न होने पर निवासी सवाल उठाते हैं और पुरानी कार्यकारिणी को हटाने की मांग करते हैं।
- बिल्डर और AOA की मिलीभगत: कई सोसाइटियों में बिल्डर अपने पसंदीदा लोगों को AOA में बिठाकर सोसाइटी के फैसलों को प्रभावित करते हैं।
- नियमों की जानकारी का अभाव: अधिकांश निवासियों को UP अपार्टमेंट एक्ट की जानकारी नहीं होती, जिसका फायदा उठाकर कुछ लोग मनमाने तरीके से AOA चलाते रहते हैं।
- प्रशासनिक हस्तक्षेप में देरी: जब मामला SDM या डिप्टी रजिस्ट्रार तक पहुंचता है, तो वहां भी फैसले में महीनों लग जाते हैं, जिससे विवाद और लंबा खिंचता है।
- व्यक्तिगत राजनीति और गुटबाजी: छोटी-छोटी सोसाइटियों में भी ‘गुट’ बन जाते हैं जो चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं।
क्या कहता है कानून — और कहां है खामी
उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम के अनुसार हर पंजीकृत आवासीय सोसाइटी में AOA का गठन अनिवार्य है और इसके चुनाव नियमित अंतराल पर होने चाहिए। लेकिन व्यवहार में न तो चुनाव समय पर होते हैं और न ही किसी नियामक संस्था की ओर से कोई सक्रिय निगरानी होती है। डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय के पास इतने मामले लंबित हैं कि वहां से समय पर न्याय मिलना मुश्किल हो जाता है — और यही वजह है कि पीड़ित निवासी सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होते हैं।
निवासियों की पीड़ा — विवाद में पिसता आम फ्लैट मालिक
इन सारे विवादों के बीच सबसे ज्यादा नुकसान उन आम निवासियों का होता है जो बस एक साफ-सुथरी, सुरक्षित और सुविधायुक्त सोसाइटी में रहना चाहते हैं। AOA विवाद के दौरान:
- सोसाइटी के रखरखाव के काम ठप हो जाते हैं
- सुरक्षा और सफाई व्यवस्था प्रभावित होती है
- मेंटेनेंस जमा करने वाले निवासी असमंजस में रहते हैं
- कानूनी खर्च की भरपाई अंततः निवासियों की जेब से होती है
आगे का रास्ता — क्या हो समाधान
पंचशील हाइनिश में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप एक संकेत है कि प्रशासनिक तंत्र AOA विवादों को हल करने में अक्षम साबित हो रहा है। जरूरत इन उपायों की है:
- AOA चुनावों की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र और सक्रिय नियामक तंत्र बनाया जाए
- डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय में AOA मामलों के लिए अलग फास्ट-ट्रैक व्यवस्था हो
- सोसाइटी के फंड का ऑडिट अनिवार्य किया जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक हो
- निवासियों को UP अपार्टमेंट एक्ट के तहत उनके अधिकारों की जानकारी दी जाए
- बार-बार विवाद करने वालों पर जुर्माने का प्रावधान हो ताकि अदालतों पर बोझ कम हो
पंचशील हाइनिश में हाईकोर्ट के फैसले ने फिलहाल एक सोसाइटी के निवासियों को राहत दी है — लेकिन नोएडा और ग्रेटर नोएडा में ऐसी दर्जनों सोसाइटियां हैं जहां यही लड़ाई अभी भी जारी है। जब तक AOA चुनावों की प्रक्रिया को पारदर्शी, समयबद्ध और निष्पक्ष नहीं बनाया जाता, तब तक यह सिलसिला थमने वाला नहीं।

