नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय तक पहुंच जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने दिल्ली नगर निगम (MCD) के क्षेत्र में आने वाले सार्वजनिक शौचालयों के औचक निरीक्षण का प्रस्ताव रखा है। इन निरीक्षणों में सोशल वर्क के छात्र और छात्राओं की टीमें शौचालयों की सफाई, स्वच्छता और ढांचागत स्थिति की जांच करेंगी। अदालत ने यह भी कहा कि बार-बार लापरवाही सामने आने पर नागरिक अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
संविधान से जुड़ी टिप्पणी
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ ने 16 अक्टूबर को जन सेवा वेलफेयर सोसाइटी की याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका सार्वजनिक शौचालयों के रखरखाव, साफ-सफाई और पर्याप्त उपलब्धता से जुड़ी है। पीठ ने कहा कि संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के तहत तय दायित्वों के अलावा स्वच्छ सार्वजनिक शौचालय तक पहुंच का अधिकार भी जीवन के अधिकार में आता है।
क्या है पूरा मामला
जन सेवा वेलफेयर सोसाइटी ने यह जनहित याचिका 2023 में दाखिल की थी। इसमें साफ पानी और बिजली के साथ स्वच्छ सार्वजनिक मूत्रालयों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। याचिका में मौजूदा शौचालयों के निरीक्षण और नए शौचालयों के निर्माण के निर्देश देने का आग्रह भी किया गया है। अक्टूबर 2023 में अदालत ने शौचालयों पर शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था लागू करने को कहा था। अदालत ने निर्देश दिया था कि DDA, MCD और दिल्ली कैंटोनमेंट बोर्ड शौचालयों पर दिखाए गए संपर्क नंबरों को जांचकर सुनिश्चित करें कि वे चालू हैं, ताकि जनता सीधे शिकायत कर सके।
पहले भी लग चुकी है फटकार
जुलाई 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय की पीठ ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया था। अदालत ने MCD, DDA और NDMC की “पूरी तरह उदासीनता और संवेदनहीनता” पर नाराजगी जताई थी। अदालत ने यह भी कहा था कि खराब हालात में महिलाओं की परेशानी और बढ़ जाती है।
जमीनी हालात पर रिपोर्ट
न्यूजलॉन्ड्री ने 2024 में उत्तर-पश्चिम और दक्षिण दिल्ली के 16 सार्वजनिक शौचालयों का ऑडिट किया था। इनमें से 11 में गंभीर समस्याएं मिली थीं। रिपोर्ट के अनुसार MCD 192 सामुदायिक और 722 सार्वजनिक शौचालयों का रखरखाव करता है। राजधानी में शौचालयों की देखरेख कई एजेंसियों के हाथ में होना भी समस्या को जटिल बनाता है।
आगे क्या
अदालत का प्रस्ताव है कि सोशल वर्क के छात्र-छात्राओं की टीमें बिना पूर्व सूचना के निरीक्षण करें। इसमें महिला शौचालयों की जांच के लिए छात्राओं को भी शामिल करने की बात है। इससे जमीनी हकीकत सीधे अदालत तक पहुंचने की उम्मीद है। मामले की अगली सुनवाई और अंतिम निर्देश आने वाली तारीखों पर तय होंगे।

