दिल्ली डीटीसी बस ड्राइवर हड़ताल, अधिकारियों ने अपनाया साम्-दाम-दंड-भेद

नई दिल्ली, दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (डीटीसी) के अनुबंधित बस ड्राइवरों की हड़ताल शुक्रवार को चौथे दिन प्रवेश कर गई। मंगलवार (15 सितंबर) से शुरू हुई इस हड़ताल ने दिल्ली की बस सेवाओं को काफी हद तक ठप कर दिया था। यात्री घंटों इंतजार कर रहे थे और सैकड़ों बसें डिपो में खड़ी रहीं। शुक्रवार को प्रशासन ने कुछ बसों को सड़क पर उतारने में सफलता हासिल की, लेकिन हड़ताल पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। ड्राइवरों का आरोप है कि अधिकारियों ने उन्हें वापस काम पर लाने के लिए प्राचीन भारतीय नीति के चार उपाय—साम्, दाम, दंड और भेद—अपनाए।

हड़ताल की पृष्ठभूमि और ड्राइवरों की मुख्य मांगें

डीटीसी के 37 डिपो में करीब 12,000 अनुबंधित ड्राइवर काम करते हैं। ये ड्राइवर थर्ड-पार्टी ठेकेदारों के माध्यम से नियुक्त हैं। स्थायी कर्मचारियों की तुलना में उन्हें कम सुविधाएं मिलती हैं। एक ड्राइवर के अनुसार, उनकी दैनिक मजदूरी लगभग 862 रुपये है। उन्हें सामाजिक सुरक्षा, सवेतन अवकाश या वार्षिक बोनस नहीं मिलता।

हड़ताल करने वाले ड्राइवरों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

न्यूनतम दैनिक वेतन 2,000 रुपये। चिकित्सा सुविधाएं और मेडिकल इंश्योरेंस। वार्षिक एवं त्योहारी बोनस। सरकारी छुट्टियों का भुगतान।
साप्ताहिक अवकाश। दुर्घटना के बाद वेतन कटौती से सुरक्षा। दैनिक रूट लिमिट 100 किलोमीटर। ठेकेदारों के बजाय सीधे डीटीसी में स्थायी नियुक्ति। दिल्ली के परिवहन मंत्री पंकज सिंह ने ड्राइवरों से हड़ताल वापस लेने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि मेडिकल इंश्योरेंस और कुछ अन्य मांगें मान ली गई हैं, जबकि वेतन संबंधी मुद्दा श्रम विभाग के साथ उठाया जाएगा।

साम्-दाम-दंड-भेद: अधिकारियों की रणनीति

प्रदर्शनकारी ड्राइवरों के अनुसार, प्रशासन ने हड़ताल तोड़ने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए:

साम् (समझाना-मनाना):
 कई डिपो में अधिकारियों ने ड्राइवरों को बैठकें बुलाकर समझाने की कोशिश की। परिवहन विभाग ने पहले भी ड्राइवरों से मुलाकात की थी।

दाम (प्रलोभन):
 कुछ ड्राइवरों पर आरोप है कि उन्हें स्थायी नौकरी का झूठा वादा करके लुभाया गया। नेहरू प्लेस डिपो के ड्राइवर रवि कुमार ने कहा, “कुछ साथियों को स्थायी बनाने का फर्जी ऑफर दिया गया।”

दंड (दबाव और धमकी):
 कालकाजी डिपो में करीब 70 अनुबंधित ड्राइवर मंगलवार से गेट के बाहर धरना दे रहे थे। शुक्रवार को दिल्ली पुलिस ने उन्हें वहां से हटाने को कहा। इनकार करने पर उन्हें जबरन हटाने का आरोप लगा। ड्राइवरों ने सामूहिक इस्तीफे देने का फैसला किया। अधिकारियों ने कहा, “आज या कल बसें निकलेंगी। अगर नौकरी चाहिए तो मदद करो, वरना कल तक स्थिति सामान्य हो जाएगी।”

भेद (फूट डालना):
 कुछ ड्राइवर काम पर लौट गए। इससे बाकी प्रदर्शनकारियों में नाराजगी फैल गई। एक ड्राइवर ने कहा, “प्रदर्शन का कोई फायदा नहीं। हमें बसें निकालने के लिए बुलाया गया है। ये ड्राइवर अपनी नौकरी खो देंगे।” शुक्रवार सुबह 11 बजे के आसपास कुछ जगहों पर स्थायी और कुछ अनुबंधित ड्राइवरों की मदद से बसें सड़क पर निकलीं। बुरारी डिपो से अकेले करीब 280 बसें पहले दो दिनों में खड़ी रहीं। लेकिन कई बसें अभी भी सड़क पर नहीं हैं और हड़ताल जारी है।

यात्रियों की परेशानी

डीटीसी बसें दिल्ली के सबसे किफायती सार्वजनिक परिवहन साधनों में से एक हैं। हड़ताल से दैनिक मजदूर, छात्र और आम यात्री सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। श्रीनिवासपुरी के एक यात्री संजय ने कहा, “मुझे 10 बजे दफ्तर पहुंचना था, लेकिन एक घंटे से बस का इंतजार कर रहा हूं।”

कानूनी पहलू: क्या कहता है कानून?

भारत में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 और दिल्ली में लागू श्रम कानूनों के तहत कर्मचारियों को सामूहिक सौदेबाजी और वैध हड़ताल का अधिकार है। अनुबंधित श्रमिकों के मामले में:

हड़ताल का अधिकार: सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं (जैसे परिवहन) में हड़ताल के लिए कुछ शर्तें लागू होती हैं। पूर्व सूचना देना अनिवार्य हो सकता है। अवैध हड़ताल पर कार्रवाई हो सकती है, लेकिन वैध मांगों पर बातचीत का प्रावधान है।
अनुबंधित बनाम स्थायी: ठेकेदारों के माध्यम से नियुक्त श्रमिकों को समान काम के लिए समान वेतन और सुविधाओं का अधिकार श्रम कानूनों (समान पारिश्रमिक अधिनियम और ठेका श्रम अधिनियम) के तहत है। सीधे स्थायी नियुक्ति की मांग कानूनी रूप से जटिल है और नीतिगत निर्णय पर निर्भर करती है।
पुलिस कार्रवाई: शांतिपूर्ण धरने को बलपूर्वक हटाने पर सवाल उठ सकते हैं। यदि कोई हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं हुआ, तो केवल स्थान खाली कराने का अधिकार सीमित है।
नौकरी से बर्खास्तगी या ब्लैकलिस्ट: बिना उचित प्रक्रिया के ब्लैकलिस्टिंग या धमकी श्रम कानूनों का उल्लंघन हो सकती है। ड्राइवर अदालत या श्रम न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं।

अभी तक हड़ताल पूरी तरह कानूनी रूप से अवैध घोषित नहीं की गई है। प्रशासन बातचीत का दावा कर रहा है, जबकि ड्राइवर दबाव और फूट डालने के आरोप लगा रहे हैं। दोनों पक्षों को श्रम विभाग या औद्योगिक न्यायाधिकरण के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए।

मौजूदा स्थिति

कुछ बसें सड़क पर लौट आई हैं, लेकिन हड़ताल समाप्त नहीं हुई है। ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें “पीठ में छुरा घोंपा” गया। प्रशासन का लक्ष्य यातायात बहाल करना है, जबकि ड्राइवर स्थायी समाधान चाहते हैं। दिल्ली की बस सेवा पूरी तरह सामान्य होने और ड्राइवरों की शिकायतों के निपटारे में अभी अंतर बना हुआ है।
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