लूट रहा माय फ्रेंड, क्या ईरान संघर्ष का बोझ ढो रहा भारत?

 

अमेरिका में बैठा एक सरकारी अधिकारी एक फैसला करे और भारत में बैठे आम आदमी के होम लोन या कार लोन की मासिक किस्त (EMI) महंगी हो जाए—यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन वैश्विक वित्तीय बाजार की जटिलताओं ने यह अब संभव कर दिया  है। सितंबर 2026 के मध्य में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यील्ड्स (US Treasury yields) लगभग 5 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गईं, जो 2007 के बाद का उच्चतम स्तर है। इस उछाल ने दुनिया भर के शेयर बाजारों और अर्थव्यवस्थाओं में चिंता पैदा कर दी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगस्त 2026 के अंत में बॉन्ड मार्केट को नियंत्रित करने के लिए सैन्य हस्तक्षेप तक की संभावना जताई थी। उन्होंने कहा था कि हस्तक्षेप के कई तरीके हैं और “अंतिम हस्तक्षेप हमारी सेना है… अगर हमें इसका इस्तेमाल करना पड़ा तो हम करेंगे।” यह बयान ट्रेजरी विभाग के बॉन्ड बाईबैक उपायों के बाद यील्ड्स फिर बढ़ने के संदर्भ में आया था। विशेषज्ञों और पर्यवेक्षकों ने इस टिप्पणी को आर्थिक वास्तविकताओं से दूर बताया। बॉन्ड मार्केट एक स्वतंत्र वित्तीय बाजार है, जहां निवेशक जोखिम और रिटर्न के आधार पर कीमतें तय करते हैं। अमेरिकी संविधान या मौजूदा कानूनों के तहत सेना को वित्तीय बाजारों में सीधे हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा कदम कानूनी रूप से अव्यावहारिक, असंवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विश्वसनीयता के लिए विनाशकारी माना जाएगा। सेना का इस्तेमाल युद्ध या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों तक सीमित है, न कि ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए।

सरकारी बॉन्ड और यील्ड क्या है?

जब किसी सरकार को खर्चों (रक्षा, सब्सिडी, बुनियादी ढांचा आदि) और कर राजस्व के बीच का अंतर पूरा करने के लिए धन की जरूरत होती है, तो वह जनता और संस्थानों से कर्ज लेती है। बदले में वह सरकारी बॉन्ड जारी करती है। इन बॉन्ड्स पर तय ब्याज दर या यील्ड निवेशकों को मिलती है। अमेरिकी सरकार के बॉन्ड दुनिया में सबसे सुरक्षित माने जाते हैं क्योंकि अमेरिका अपनी मुद्रा स्वयं जारी कर सकता है और डिफॉल्ट का जोखिम न्यूनतम माना जाता है। जब इन सुरक्षित बॉन्ड्स पर यील्ड बढ़ती है, तो अन्य देशों और कंपनियों को भी ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ता है। इससे पूरे वित्तीय तंत्र में उधारी महंगी हो जाती है। OECD के अनुसार अमीर देशों का सरकारी बॉन्ड बाजार पहले ही बहुत बड़ा है। वैश्विक स्तर पर सरकारी और कॉर्पोरेट बॉन्ड मिलाकर बाजार का आकार दुनिया की कुल GDP से भी बड़ा है। ऐसे में अमेरिकी यील्ड्स में तेज वृद्धि वैश्विक स्तर पर ऋण लागत बढ़ा सकती है।

यील्ड्स क्यों बढ़ रही हैं?

सितंबर 2026 तक अमेरिकी संघीय कर्ज लगभग 40.1 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंच चुका था। यह विश्व के कुल सरकारी कर्ज का बड़ा हिस्सा है। ट्रंप प्रशासन के दौरान घाटा और कर्ज बढ़ता रहा है। साथ ही फरवरी 2026 के आसपास शुरू हुए ईरान से संबंधित सैन्य संघर्ष ने ऊर्जा कीमतों में उछाल लाया, जिससे मुद्रास्फीति के दबाव बढ़े। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट (Scott Bessent) ने लंबे अवधि के बॉन्ड्स को वापस खरीदकर यील्ड्स को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन निवेशकों का भरोसा पूरी तरह नहीं लौटा। फेडरल रिजर्व के नए चेयरमैन केविन वॉर्श (Kevin Warsh) ने मुद्रास्फीति नियंत्रण पर जोर देते हुए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का समर्थन किया। ये घटनाएं मिलकर निवेशकों को ज्यादा जोखिम प्रीमियम मांगने पर मजबूर कर रही हैं। जब सबसे सुरक्षित कर्जदार (अमेरिका) पर यील्ड बढ़ती है, तो बाकी दुनिया पर और ज्यादा दबाव पड़ता है।

भारत और आम आदमी पर असर

अमेरिकी यील्ड्स का सीधा असर वैश्विक पूंजी प्रवाह, मुद्राओं और ब्याज दरों पर पड़ता है। भारत में बैंकों की फंडिंग लागत प्रभावित हो सकती है। इससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें दबाव में आ सकती हैं, जिससे नई EMI महंगी हो सकती है। पुराने फ्लोटिंग रेट लोन वाले लोगों पर भी असर पड़ सकता है।

कंपनियों के लिए उधारी महंगी होने से निवेश और नई नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। सरकारों को पुराने कर्ज पर ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ सकता है, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे पर खर्च कम हो सकता है। अमेरिका स्वयं अपनी रक्षा बजट से ज्यादा पैसा ब्याज भुगतान पर खर्च कर रहा है यह वैश्विक चेतावनी है। भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी मौद्रिक नीति स्वतंत्र रूप से तय करता है, लेकिन वैश्विक रुझानों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। पूंजी बहिर्वाह या रुपये पर दबाव जैसी स्थितियां घरेलू दरों को प्रभावित कर सकती हैं।

समाधान की राह

विशेषज्ञों के अनुसार यील्ड्स को नियंत्रित करने के लिए तीन मुख्य कदम जरूरी हैं:

  1. राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation): अनावश्यक खर्च कम करना और घाटा नियंत्रित करना।
  2. विकास पर ध्यान: ऐसी नीतियां जो अर्थव्यवस्था की वृद्धि बढ़ाएं, ताकि कर्ज-जीडीपी अनुपात सुधरे।
  3. नीतिगत विश्वसनीयता: फेडरल रिजर्व को मुद्रास्फीति लक्ष्य (2 प्रतिशत) के प्रति गंभीर रहना होगा, भले ही राजनीतिक दबाव हो।

2022 में ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री लिज ट्रस के गलत बजट फैसले का उदाहरण याद दिलाता है कि भरोसा टूटने में बहुत कम समय लगता है और बाजार सजा दे सकता है। अमेरिकी बॉन्ड मार्केट की विशालता और प्रभाव को देखते हुए राजनीतिक सलाहकार जेम्स कारविल की पुरानी बात आज भी प्रासंगिक है—बॉन्ड मार्केट किसी भी नेता को डरा सकता है। ट्रंप प्रशासन के बाकी कार्यकाल में राजकोषीय अनुशासन और विश्वसनीय नीतियां अपनाई जाती हैं या नहीं, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे देशों की आम जनता की जेब दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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