CJP performance monitoring controversy: नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए युवा प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई एआई-आधारित निगरानी व्यवस्था और कथित उत्पीड़न के मामलों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक तरफ छात्र कार्यकर्ता ऐशे घोष ने दिल्ली उच्च न्यायालय में सामूहिक निगरानी को असंवैधानिक बताते हुए याचिका दायर की है, तो दूसरी तरफ प्रदर्शन में भोजन वितरण करने वाले वॉलंटियर जुनैद मलिक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। उन्होंने पुलिस द्वारा खुद को अवैध रूप से हिरासत में लेने और परिवार को परेशान करने का आरोप लगाया है।
प्रदर्शन NEET परीक्षा पेपर लीक के मुद्दे पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हुआ था। यह पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा युवा आंदोलन माना जा रहा है। प्रदर्शन समाप्त होने और प्रधान के इस्तीफे के बाद भी निगरानी और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मुद्दे अदालतों में पहुंच गए हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट में निगरानी का मुद्दा
छात्र कार्यकर्ता और जेएनयू पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष घोष ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर प्रदर्शनकारियों पर सामूहिक निगरानी को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। उन्होंने मांगा है कि प्रदर्शन के दौरान एकत्र किया गया सारा व्यक्तिगत डेटा नष्ट किया जाए और निगरानी तकनीक के इस्तेमाल के लिए दिशानिर्देश बनाए जाएं।
प्रदर्शन स्थल पर दिल्ली पुलिस की ‘इक्षना’ (Ikshana) नामक मोबाइल सर्विलांस वैन लगाई गई थी। इसमें एआई-संचालित कैमरे, टेलीस्कोपिक मास्ट पर लगे 360 डिग्री व्यू वाले कैमरे और फेशियल रिकग्निशन सिस्टम शामिल थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के इंस्टाग्राम हैंडल भी नोट किए। पुलिस का दावा है कि इससे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की पहचान की गई और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिली। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि इससे 2500 से अधिक आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान हुई।
भारत में पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला कोई विशिष्ट कानून नहीं है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल पर ऐसी व्यापक निगरानी कानूनी रूप से अनुचित है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर प्रदर्शन स्थल पर एकत्र बायोमेट्रिक डेटा हटाने की मांग की थी। दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर कहा कि उसने फेशियल रिकग्निशन के जरिए किसी की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं लगाया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि सार्वजनिक सभा में निजता का दावा विडंबनापूर्ण है और ये जांचें वैध राज्य हित में आवश्यक थीं। सोमवार को हुई संक्षिप्त सुनवाई में अदालत ने याचिका पर आगे की सुनवाई मंगलवार के लिए रखी।
जुनैद मलिक का सुप्रीम कोर्ट में आरोप
इस बीच, CJP प्रदर्शन में छात्रों को खाना-पानी बांटने वाले वॉलंटियर जुनैद मलिक (मोहम्मद जुनैद मलिक) सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया, धमकाया और उनके परिवार के खिलाफ बिना उचित प्रक्रिया के कार्रवाई की। जुनैद का आरोप है कि वे आरएमएल अस्पताल से लौट रहे थे तभी सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उन्हें उठाकर ले गए। उन्हें कई घंटे वाहन में रखा गया, आंखों पर पट्टी बांधी गई और भोजन वितरण के फंड के स्रोत के बारे में पूछताछ की गई। बाद में उन्हें उत्तराखंड के मसूरी में छोड़ दिया गया। उनके परिवार का कहना है कि गाजियाबाद स्थित उनके घर पर पुलिस बार-बार पहुंची, बुजुर्ग पिता और रिश्तेदारों से पूछताछ की तथा दस्तावेज मांगे। मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जुनैद ने सुप्रीम कोर्ट में इन आरोपों के साथ याचिका दायर की है। दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, हालांकि जांच का दावा किया गया है।
सरकार और पुलिस का पक्ष
सरकार और पुलिस का रुख है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ये कदम जरूरी थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर विपक्ष और डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता अक्सर निगरानी शक्तियों के विस्तार का आरोप लगाते रहे हैं, जिसे सरकार सार्वजनिक हित में कार्रवाई बताकर खारिज करती है। प्रदर्शन समाप्त होने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तथा परीक्षा प्रणाली सुधार के लिए पैनल गठित होने के बावजूद ये अदालती चुनौतियां जारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला निगरानी तकनीक के इस्तेमाल में जवाबदेही और अनुपात के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण परीक्षण साबित हो सकता है।

