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बिहार के बेतिया के संचित पटेल ने किया IJSO के लिए चयन, बुल्गारिया में करेंगे भारत का प्रतिनिधित्व – जय हिन्द जनाब बिहार के बेतिया के संचित पटेल ने किया IJSO के लिए चयन, बुल्गारिया में करेंगे भारत का प्रतिनिधित्व – जय हिन्द जनाब

बिहार के बेतिया के संचित पटेल ने किया IJSO के लिए चयन, बुल्गारिया में करेंगे भारत का प्रतिनिधित्व

बिहार के सुदूर ग्रामीण इलाके बेतिया से एक प्रेरणादायक सफलता की कहानी सामने आई है। संचित पटेल नामक छात्र ने अंतरराष्ट्रीय जूनियर साइंस ओलंपियाड (IJSO) के लिए भारतीय टीम में चयन हासिल कर देश का नाम रोशन किया है। वह बुल्गारिया में आयोजित होने वाले इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। ‘ओलंपियाड वाला’ और ‘फिजिक्स वाला’ प्लेटफॉर्म से जुड़े संचित की यह उपलब्धि ग्रामीण भारत में छिपे प्रतिभाओं को नई प्रेरणा दे रही है। उनके शिक्षक ने बताया कि संचित ने न केवल कड़ी मेहनत की, बल्कि प्रयोगों (experiments) को इतनी स्पष्टता और हैंडलिंग के साथ सीखा कि वह वाकई अद्भुत है।

ओलंपियाड की चुनौतीपूर्ण यात्रा

IJSO विज्ञान के क्षेत्र में किशोर छात्रों (15 वर्ष तक) के लिए विश्व स्तर की सबसे बड़ी प्रतियोगिताओं में से एक है, जिसमें थ्योरी, प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट्स और ग्रुप प्रोजेक्ट्स शामिल होते हैं। संचित ने विस्तार से बताया कि चयन प्रक्रिया अत्यंत कठिन है: NSEJS (National Standard Examination in Junior Science): लगभग 60,000-70,000 छात्रों में से राज्य कोटा के आधार पर चयन। INJSO (Indian National Junior Science Olympiad): टॉप 300-400 छात्र। OCSC (Orientation-cum-Selection Camp): IISc के चैलकेरे कैंपस में थ्योरी, MCQ, ग्रुप एक्सपेरिमेंट्स और प्रैक्टिकल टेस्टिंग। संचित ने तैयारी की शुरुआत यूट्यूब से की। उन्होंने ‘ओलंपियाड वाला’ चैनल देखा, फिर पेड बैच जॉइन किया। कोटा (राजस्थान) जाकर एक्सपेरिमेंट्स की विशेष ट्रेनिंग ली, जहां उपकरणों को संभालने, माइक्रोस्कोप फोकसिंग जैसी स्किल्स पर फोकस किया गया।

ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंची ओलंपियाड की तैयारी

अध्यापक ने खासतौर पर ‘ओलंपियाड वाला’ टीम की सराहना की। उन्होंने कहा कि पहले ओलंपियाड की तैयारी सिर्फ बड़े शहरों और महंगे कोचिंग संस्थानों तक सीमित थी। लेकिन अलख पांडे (Alakh Pandey) के दृष्टिकोण और टीम की मेहनत से यह तैयारी किफायती दामों पर बिहार के बेतिया जैसे छोटे कस्बों तक पहुंची। शिक्षक ने भावुक होकर याद किया कि संचित के पिता हमेशा कहते थे- “कहीं कोई ग़म न रह जाए।” आज वे गर्व से कह रहे हैं कि कोई कमी नहीं छोड़ी गई। उन्होंने जोर देकर कहा कि ओलंपियाड की तैयारी स्कूल की पढ़ाई को आसान बना देती है, क्योंकि यह ‘सीखने की कला’ (Art of Learning) सिखाती है- जो भविष्य की किसी भी चुनौती के लिए तैयार करती है। दूसरे शिक्षक ने सलाह दी कि 8वीं-9वीं कक्षा से ही वैचारिक स्पष्टता (conceptual clarity) पर फोकस करें। रट्टा मारने की बजाय गहरी समझ विकसित करें, तो ओलंपियाड के साथ-साथ करियर में भी फायदा होता है।

माता-पिता और शिक्षकों का अहम योगदान

संचित ने अपने माता-पिता और शिक्षकों का विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “माता-पिता ने कभी हार नहीं मानने दी। शिक्षकों ने हर डाउट सुलझाया और लगातार मोटिवेट किया।” ऑफलाइन ट्रेनिंग सेशन्स और क्वेश्चन प्रैक्टिस ने भी उनकी तैयारी को मजबूत बनाया। यह सफलता सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है- जहां ग्रामीण भारत का बच्चा अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंच रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स से आने वाले समय में भारत से और कई संचित निकलेंगे, जो देश का गौरव बढ़ाएंगे। संचित पटेल की यह उपलब्धि साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, कड़ी मेहनत और सुलभ संसाधनों से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। बेतिया जैसे छोटे शहर से बुल्गारिया तक की यह यात्रा हजारों छात्रों के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी।

शुभकामनाएं संचित! भारत तुम पर गर्व कर रहा है।

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