बेलग्रेड/मिलान/ब्रुसेल्स/तिराना, पूरे यूरोप में जेनरेशन Z (लगभग 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) के नेतृत्व में प्रदर्शनों की लहर फैल गई है। फ्रांस, इटली, बेल्जियम, अल्बानिया और सर्बिया जैसे देशों में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए हैं। उनकी मुख्य शिकायतें हैं – महंगाई, स्कूलों की खराब हालत, आर्थिक अवसरों की कमी, आवास संकट, भ्रष्टाचार और यह अहसास कि उनकी आवाज कोई नहीं सुन रहा।
ब्रुसेल्स की 19 वर्षीय छात्रा माया गौर्डेल डेस्क पर बैठकर नारे लिख रही थीं – “If we burn, you burn with us!” (अगर हम जलेंगे तो तुम भी हमारे साथ जलोगे)। यह नारा 2012 की फिल्म ‘द हंगर गेम्स’ से लिया गया है, जिसे दुनिया भर के युवा आंदोलनों ने अपनाया है। माया ने रॉयटर्स से कहा, “हमने शांतिपूर्ण तरीके से कोशिश की। कोई हमारी बात नहीं सुनता था। जब लोग कचरा जलाने जैसी चीजें करने लगे तभी मीडिया और कैमरे हमारी तरफ मुड़े।”
पेरिस के उपनगरों से लेकर बेलग्रेड के चौराहों तक युवा सड़कों पर हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली और महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन कई बार हिंसक हो गए, जहां दुकानों को नुकसान पहुंचा और पुलिस ने वॉटर कैनन व स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। इटली में युवा शिक्षा व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और महंगे मकानों से परेशान हैं। अल्बानिया में प्रधानमंत्री एडी रामा के खिलाफ भ्रष्टाचार और नौकरियों की कमी को लेकर प्रदर्शन हुए।
सबसे बड़ा बदलाव सर्बिया में देखा गया। लगभग दो साल से चल रहे छात्र आंदोलन के बाद संसदीय चुनाव में लंबे समय से सत्ता में रहे नेता अलेक्जेंडर वुचिच को हार का सामना करना पड़ा। छात्र सूची “स्टूडेंट लिस्ट – स्टूडेंट्स विन” की जीत ने युवाओं की ताकत दिखा दी। यूरोपीय संघ के 2025 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 16 से 30 वर्ष के 40 प्रतिशत युवा बढ़ती कीमतों और महंगाई को अपनी सबसे बड़ी चिंता मानते हैं। यूरोपीय संघ में गरीबी या सामाजिक बहिष्कार के जोखिम वाले 9.27 करोड़ लोगों में 18-24 वर्ष के युवाओं का जोखिम सबसे ज्यादा (26.3 प्रतिशत) है।
ये प्रदर्शन अकेले यूरोप तक सीमित नहीं। 2024 में बांग्लादेश, 2025 में नेपाल और इस साल भारत में भी Gen Z ने अपनी आवाज बुलंद की थी। अब जर्मनी में भी इस सप्ताह महंगाई, असमानता, युद्ध और स्कूलों की हालत को लेकर प्रदर्शन होने वाले हैं। युवाओं का कहना है कि वे निष्क्रिय नहीं रहना चाहते। वे बेहतर शिक्षा, सस्ते आवास, नौकरियां और सरकार से सुनी जाने की मांग कर रहे हैं। “कोई हमारी बात नहीं सुनता” – यही वाक्य आज यूरोप के युवा आंदोलन का मुख्य स्वर बन गया है।
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