भारत ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के एच-1बी टिप्पणी को आपत्तिजनक करार दिया

नई दिल्ली, भारत ने शुक्रवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की उस टिप्पणी पर कड़ा आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने एच-1बी वीजा धारकों को ‘indentured servants’ (अनुबंधित मजदूर) करार दिया था। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसे “अवांछित” और “गहराई से आपत्तिजनक” बताया तथा कहा कि यह शब्द औपनिवेशिक इतिहास और दर्दनाक विरासत से जुड़ा है।

यह प्रतिक्रिया अमेरिकी श्रम विभाग के उस फैसले के बाद आई, जिसमें आठ बड़ी टेक कंपनियों—माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, कैपजेमिनी, इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट—को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित कर दिया गया। PERM वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए कंपनियां विदेशी कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड (स्थायी निवास) का आवेदन करती हैं।

वेंस की टिप्पणी क्या थी?

गुरुवार को वीजा फ्रॉड पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए वेंस ने आरोप लगाया कि कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह सस्ते विदेशी श्रम को रख रही हैं। उन्होंने कहा, “अगर आप अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे हैं, तो आप समान पद पर अमेरिकी नागरिक से 20,000 डॉलर कम कमा रहे हैं। अगर आपको किसी विदेशी आउटसोर्सिंग फर्म ने लाया है, तो यह अंतर 48,000 डॉलर तक पहुंच जाता है।”

उन्होंने आगे कहा, “आप देश के बाहर से indentured servants लाते हैं, अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकालते हैं और कॉरपोरेट मुनाफा कमाते हैं।” माइक्रोसॉफ्ट का उदाहरण देते हुए उन्होंने दावा किया कि कंपनी ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को निकालते हुए हजारों एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड फाइलिंग का लाभ लिया।

अमेरिकी श्रम सचिव ने भी इन कंपनियों पर 2009 से लगभग 30 लाख विदेशी कामगारों की मांग करने और लाखों एच-1बी तथा PERM स्वीकृतियां लेने का आरोप लगाया। विभाग का दावा है कि जांच में 22 अरब डॉलर का वीजा फ्रॉड सामने आया है।

भारत का जवाब

विदेश मंत्रालय ने बयान में साफ कहा कि PERM एच-1बी वीजा कार्यक्रम से अलग है। निलंबन मौजूदा एच-1बी वीजा या उनके आश्रितों की स्थिति को प्रभावित नहीं करता, हालांकि प्रभावित कंपनियों के पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

MEA ने लिखा, “हमारा मानना है कि ऐसी वर्णनाएं अवांछित हैं और इस तथ्य को नजरअंदाज करती हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल योगदानकर्ता हैं, जो इसकी अर्थव्यवस्था और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देते हैं। वास्तव में, संयुक्त राज्य अमेरिका का इतिहास स्वयं उन पीढ़ियों के आप्रवासियों द्वारा आकार दिया गया है, जिनके श्रम, उद्यम और नवाचार ने इसकी वृद्धि और समृद्धि में योगदान दिया है। दर्दनाक ऐतिहासिक और औपनिवेशिक विरासत के अर्थ वाले शब्दों का सहारा लेना गहराई से आपत्तिजनक है।”

मंत्रालय ने जोर दिया कि प्रतिभाओं की आवाजाही दोनों देशों के लिए पारस्परिक लाभ का क्षेत्र है। यह भारतीय पेशेवरों को अवसर देती है, साथ ही अमेरिकी कंपनियों को अत्याधुनिक प्रतिभा, नवाचार, अनुसंधान, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मकता और रोजगार सृजन में मदद करती है तथा अमेरिकी शेयरधारकों के लिए संपत्ति बनाती है। MEA के अनुसार, अमेरिका के ये कदम दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाते। भारत अमेरिकी अधिकारियों से संपर्क में है और घटनाक्रम पर नजर रख रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ और प्रभाव

‘Indentured servants’ शब्द भारत के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है। 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में सैकड़ों हजार भारतीय मजदूर ब्रिटिश उपनिवेशों—मॉरीशस, फिजी, कैरेबियन और दक्षिण अफ्रीका—में अनुबंधित मजदूर के रूप में भेजे गए थे। वे कठिन परिस्थितियों में काम करते थे। इसी इतिहास को ध्यान में रखते हुए भारत ने वेंस की भाषा पर आपत्ति जताई।

इस घटनाक्रम का असर उन भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ सकता है, जो प्रभावित कंपनियों में ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया में हैं। मौजूदा एच-1बी वीजा धारक फिलहाल सुरक्षित हैं, लेकिन स्थायी निवास का रास्ता लंबा हो सकता है। भारत-अमेरिका व्यापारिक और तकनीकी साझेदारी के संदर्भ में यह मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में नई जटिलता पैदा कर रहा है।

भारत सरकार ने साफ संकेत दिया है कि कुशल पेशेवरों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और ऐसी भाषा से बचने की जरूरत है, जो ऐतिहासिक घावों को छूती हो। दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहने की उम्मीद है।

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