नोएडा के गांवों में अवैध इमारतों पर अब अफसरों की भूमिका भी जांच के घेरे में? हरीश चंद्र की बर्खास्तगी ने बढ़ाए सवाल

नोएडा। नोएडा प्राधिकरण के गांवों में लंबे समय से हो रहे अवैध निर्माण और जमीन पर कब्जे को लेकर अब सवाल सिर्फ भूमाफियाओं तक सीमित नहीं हैं। सलारपुर, भंगेल, बरोला और हाजीपुर जैसे इलाकों में नियमों के विपरीत निर्माण को लेकर प्राधिकरण की ओर से कार्रवाई और चेतावनियां जारी होती रही हैं। ऐसे में अब यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन इलाकों में वर्षों तक अवैध निर्माण खड़े होते रहे, वहां संबंधित वर्क सर्किल के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच कब और किस स्तर पर होगी।

इसी बीच नोएडा प्राधिकरण के पूर्व सचिव और वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हरीश चंद्र की सेवा से बर्खास्तगी ने इस पूरे मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 28 सितंबर 2026 को उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी किया। यह कार्रवाई ग्राम शहदरा से जुड़े पुराने लीजबैक प्रकरण में विभागीय जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद हुई है।

3.81 लाख वर्गमीटर जमीन के लीजबैक मामले में हुई कार्रवाई

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 3 सितंबर 2026 के फैसले के अनुसार, हरीश चंद्र के खिलाफ 27 सितंबर 2013 को विभागीय जांच शुरू की गई थी। जांच का एक प्रमुख हिस्सा नोएडा प्राधिकरण द्वारा अर्जित और कब्जा प्राप्त 3,81,527 वर्गमीटर भूमि की लीजबैक प्रक्रिया से संबंधित था। यह जमीन सेक्टर-140ए, 141, 142 और 143 के क्षेत्र में बताई गई है।

विभागीय आरोपों के मुताबिक, ग्राम शहदरा की आबादी के सर्वे में नियमों के अनुसार सैटेलाइट इमेज का इस्तेमाल किया जाना था, लेकिन जांच में तथ्यों को छिपाने और गलत तरीके से सर्वे रिपोर्ट तैयार करने के आरोप सामने आए। न्यायिक रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि कुछ निजी कंपनियों और गांव के बाहर के लोगों को लीजबैक के दायरे में शामिल किए जाने के आरोप थे।

जांच रिकॉर्ड के मुताबिक, नियमों के तहत एक परिवार को अधिकतम 450 वर्गमीटर तक जमीन के लीजबैक की अनुमति थी, जबकि कुछ मामलों में इससे कहीं अधिक क्षेत्रफल के भूखंडों से संबंधित लीज डीड कराए जाने के आरोप लगाए गए।

करीब 4 हजार करोड़ रुपये की जमीन का मामला

शासन की कार्रवाई पर प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, जांच में करीब 4,00,447 वर्गमीटर जमीन का बाजार मूल्य लगभग 4,000 करोड़ रुपये आंका गया था। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि भ्रामक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर बाहरी लोगों और निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली लीजबैक प्रक्रिया हुई। इन आरोपों के आधार पर विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ी और अब हरीश चंद्र को सेवा से बर्खास्त किया गया है।

हालांकि, हाईकोर्ट के फैसले में यह भी स्पष्ट है कि विभागीय जांच लंबे समय तक लंबित रही थी और इसी देरी को लेकर न्यायिक कार्यवाही हुई। इसलिए खबर में बर्खास्तगी के कारणों के साथ पूरी न्यायिक पृष्ठभूमि बताना जरूरी है।

सलारपुर-भंगेल-हाजीपुर में भी सामने आ चुका है बड़ा अवैध निर्माण नेटवर्क

दूसरी तरफ, नोएडा प्राधिकरण ने जून 2026 में सलारपुर, भंगेल और हाजीपुर के कई खसरों को लेकर सार्वजनिक चेतावनी जारी की थी। प्राधिकरण के मुताबिक इन जमीनों पर नोटिफाइड, अधिग्रहित या प्राधिकरण के कब्जे वाली भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण किए जाने की शिकायतें मिली थीं। प्राधिकरण ने इन स्थानों पर बने निर्माणों को लेकर ध्वस्तीकरण और सीलिंग की कार्रवाई तथा एफआईआर की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया था।

प्राधिकरण की सूची में सलारपुर के कई खसरे, भंगेल बेगमपुर के खसरा नंबर 176, 178, 217, 221, 223, 225, 226, 247, 250 और 251 तथा हाजीपुर का खसरा नंबर 412 शामिल था। प्राधिकरण ने कहा था कि इन चिन्हित भूखंडों पर भवन मानचित्र स्वीकृत नहीं हैं और ऐसे निर्माण अनधिकृत हैं।

सलारपुर में 60 से ज्यादा अवैध इमारतों की रिपोर्ट

सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सलारपुर में 24 भूखंडों पर 60 से ज्यादा अनधिकृत इमारतें खड़ी होने की जानकारी सामने आई थी। रिपोर्ट में कुछ इमारतों के सात मंजिल तक बनने और 39 डेवलपर्स के निर्माण से जुड़े होने का उल्लेख किया गया था। प्राधिकरण ने वहां निगरानी के लिए अधिकारियों और फील्ड स्टाफ की टीम भी तैनात की थी।

यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सवाल उठता है कि यदि किसी क्षेत्र में लगातार बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा था तो संबंधित वर्क सर्किल के स्तर पर उसकी निगरानी, नोटिस और कार्रवाई किस तरह हुई।

हाजीपुर में भी हो चुकी है बड़ी कार्रवाई

सितंबर 2026 में नोएडा प्राधिकरण ने हाजीपुर के खसरा नंबर 412 में अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए जमीन को कब्जामुक्त कराया। रिपोर्टों के अनुसार, यहां करीब 7,950 वर्गमीटर अधिग्रहित भूमि पर निर्माण का मामला था और अदालत से कानूनी अड़चन दूर होने के बाद कार्रवाई की गई।

यानी एक तरफ प्राधिकरण अवैध निर्माणों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल लगातार बना हुआ है कि इन निर्माणों को शुरुआती स्तर पर रोकने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की थी, उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी।

क्या अब वर्क सर्किल के अधिकारियों तक पहुंचेगी जांच?

यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। हरीश चंद्र की बर्खास्तगी जिस पुराने लीजबैक प्रकरण से जुड़ी है, वह सीधे सलारपुर, भंगेल या बरोला के मौजूदा अवैध निर्माण मामलों का हिस्सा नहीं है। लेकिन इस कार्रवाई ने नोएडा में जमीन, निर्माण और प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था में अधिकारियों की जवाबदेही पर बहस जरूर तेज कर दी है।

यदि जांच एजेंसियां नोएडा के गांवों में अवैध निर्माण और जमीन कब्जे की अलग-अलग शिकायतों की भी जांच करती हैं, तो संबंधित वर्क सर्किल, इंजीनियरिंग स्टाफ, निरीक्षण रिपोर्ट, जारी नोटिस, ध्वस्तीकरण कार्रवाई और एफआईआर के रिकॉर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

फिलहाल ऐसा कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि सलारपुर, भंगेल या बरोला के अवैध निर्माण मामले में संबंधित वर्क सर्किल के किसी अधिकारी को इस आधार पर दोषी ठहराया गया है। इसलिए आगे की जांच और आधिकारिक कार्रवाई का इंतजार करना होगा।

असली सवाल: अवैध इमारत बनने के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?

नोएडा के गांवों में तेजी से बढ़ते अवैध निर्माण के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना स्वीकृत नक्शे के कई मंजिल की इमारतें बनने तकअवैध इमारत निगरानी तंत्र क्या करता रहा। जब प्राधिकरण खुद सार्वजनिक नोटिस जारी कर इन जमीनों को अधिग्रहित/नोटिफाइड बताता है और निर्माण को अनधिकृत कहता है, तो निर्माण की शुरुआती अवस्था में कार्रवाई और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। अब देखना यह होगा कि अवैध निर्माण पर चल रहा अभियान सिर्फ इमारतों को गिराने तक सीमित रहता है या उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय होती है, जिनके कार्यक्षेत्र में ये निर्माण वर्षों तक खड़े होते रहे।

 

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