वरिष्ठ अधिवक्ता का बयान लाया भूचाल, माफ हो सकता है हर्जाना?

नोएडा में अप्रैल 2026 में मजदूरों के वेतन वृद्धि और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग को लेकर हुए धरना-प्रदर्शन के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा एवं सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी (आकृति चौधरी) पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) लगाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस हिरासत को रद्द करते हुए गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम सहित संबंधित अधिकारियों पर कड़ी टिप्पणियां की थीं और 5 लाख रुपये का मुआवजा उनके वेतन से वसूलने का आदेश दिया था। अब DM मेधा रूपम ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं मानवाधिकार आयोग से जुड़े ध्रुव कुमार ने इस पूरे प्रकरण पर विस्तार से अपनी राय रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि NSA लगाने का आधार मुख्य रूप से पुलिस रिपोर्ट पर आधारित था, जबकि CID या विजिलेंस रिपोर्ट अलग प्रकृति की होती है। उन्होंने कहा कि NSA उन लोगों पर लगाया जाता है जो देश की सुरक्षा के लिए अत्यंत घातक माने जाते हैं। आकृति चौधरी जैसी छात्रा-कार्यकर्ता, जिनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और जिनके खिलाफ हिंसा भड़काने का ठोस सबूत नहीं था, उन पर यह कठोर कानून लगाना उचित नहीं था।

हाईकोर्ट का क्या था आदेश?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने 2 सितंबर 2026 को आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हिरासत का आदेश बिना दिमाग लगाए (without application of mind) पारित किया गया था और यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत ने राज्य की कहानी को “गढ़ा हुआ” (concocted story) बताया और स्पष्ट किया कि उपलब्ध सामग्री (व्हाट्सऐप चैट, वीडियो आदि) से आकृति द्वारा हिंसा भड़काने का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

कोर्ट ने DM मेधा रूपम के आचरण को “व्यंग्य के योग्य” (worthy of derision) बताया और कहा कि वे एक मिसाल कायम करना चाहती थीं ताकि मजदूरों के समर्थन में बोलने वाले दूसरे लोग डर जाएं। अदालत ने यह भी कहा कि DM ने अपनी शपथ का उल्लंघन किया है। 5 लाख रुपये का मुआवजा आकृति चौधरी को देने और इसकी वसूली DM मेधा रूपम सहित SHO तक के जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से करने का आदेश दिया गया। साथ ही, कोर्ट की नाराजगी को इन अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश भी दिया गया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी निरंकुश व्यवहार करते रहे तो उत्तर प्रदेश “ऑरवेलियन डायस्टोपिया” बन सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता की राय: NSA का दुरुपयोग और संवैधानिक सीमाएं

ध्रुव कुमार ने कहा कि NSA का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प नहीं हो सकता। यह केवल उन मामलों के लिए है जहां व्यक्ति या संगठन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा हो। पुलिस रिपोर्ट पर सिर्फ निर्भर रहकर DM को NSA लगाने का अधिकार नहीं है; उन्हें स्वतंत्र रूप से सबूतों की जांच करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि NSA लगाने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) को है, लेकिन उसके ऊपर कमिश्नर आदि की निगरानी भी रहती है।

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब प्रशासनिक अधिकारी किसी भी प्रदर्शनकारी या वक्ता पर कार्रवाई से पहले दो बार सोचेंगे। “अगर कोई IAS अधिकारी या मजिस्ट्रेट नियम और कानून की सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई करता है तो हाईकोर्ट का यह आदेश उनके सिर पर तलवार की तरह लटका रहेगा,” उन्होंने कहा। आकृति चौधरी के मामले में कोर्ट ने पाया कि वे कोई खतरनाक अपराधी नहीं थीं। मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। NSA लगाने से पहले यह साबित होना चाहिए कि सामान्य कानून अपर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हो सकता है?

DM मेधा रूपम ने हाईकोर्ट के आदेश, विशेषकर वेतन से 5 लाख रुपये वसूली के हिस्से को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पहले संकेत दिया था कि सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी।

ध्रुव कुमार का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट कुछ राहत दे सकता है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि 5 लाख रुपये वाले हिस्से को वेव कर दिया जाएगा, लेकिन आदेश के बाकी हिस्से (NSA हिरासत रद्द करने और अन्य टिप्पणियां) बरकरार रह सकते हैं।” उन्होंने जोर दिया कि पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए, लेकिन व्यक्तिगत वेतन से वसूली का मुद्दा अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि हर राज्य की सरकार का अपना तरीका होता है, लेकिन NSA का इस्तेमाल सावधानी से होना चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी जहां सुरक्षा बल के जवान मारे जाते हैं, वहां भी NSA का इस्तेमाल सीमित होता है। मूल सिद्धांत यह है कि राष्ट्रीय हित के खिलाफ काम करने वालों पर ही यह कानून लागू होना चाहिए।

कानूनी स्पष्टीकरण

NSA की प्रकृति: राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 एक निवारक निरोध कानून है। इसके तहत बिना मुकदमा चलाए एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका: पुलिस रिपोर्ट पर सिर्फ निर्भर नहीं रहना चाहिए। स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है।
अनुच्छेद 21: व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होने पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है और मुआवजा भी दे सकती है।
मुआवजा वसूली: हाईकोर्ट ने सार्वजनिक खजाने से नहीं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूली का आदेश दिया, जो जवाबदेही तय करने का सख्त तरीका है।

यह मामला सिर्फ एक छात्रा की हिरासत का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और कठोर कानूनों के दुरुपयोग की सीमाओं का है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक आकृति चौधरी अन्य आपराधिक मामलों में हिरासत में हैं, क्योंकि NSA हिरासत रद्द होने के बावजूद कई FIR में उनके खिलाफ कार्यवाही जारी है।

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