नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन से जुड़ी 14 वर्षीय एक नाबालिग बच्ची को धमकाए जाने और उसके घर पर पथराव किए जाने के आरोपों को बेहद गंभीरता से लिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस ज्योयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, ने कहा कि किसी नाबालिग को डराने-धमकाने के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता और आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाने पर किसी को भी पीड़िता या उसके परिवार को डराने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
मामला क्या है
यह पूरा विवाद जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन के दौरान शुरू हुआ था, जब खुद को ‘कट्टर हिंदू’ बताने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज पर छात्र कार्यकर्ता निशु आज़ाद के पिता संजय कुमार पर हमला करने का आरोप लगा। भारद्वाज का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह कथित तौर पर हमले की बात स्वीकारते और अपने ‘राजनीतिक रसूख’ के चलते बच निकलने का दावा करते नज़र आए, हालांकि बाद में उन्होंने मीडिया से कहा कि यह आत्मरक्षा में किया गया कृत्य था। दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से भारद्वाज को हिरासत में लिया और बाद में गिरफ्तार कर लिया। मामले में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आपराधिक धमकी से जुड़ी धाराएं भी जोड़ी गईं। इसके बाद पुलिस ने नाबालिग कार्यकर्ता की शिकायत पर पॉक्सो एक्ट के तहत एक अलग एफआईआर भी दर्ज की बच्ची ने आरोप लगाया कि अपने पिता पर हुए हमले के बारे में खुलकर बोलने के बाद उसे ऑनलाइन धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। पिछले सोमवार दिल्ली हाईकोर्ट ने भारद्वाज की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली हेबियस कॉर्पस याचिका भी खारिज कर दी थी, जिसके बाद पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
गुरुवार को छात्र प्रदर्शन से जुड़े एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान वकील ने कोर्ट के सामने नाबालिग बच्ची से जुड़ी चिंताएं रखीं। वकील ने बताया कि आरोपी ने खुद वीडियो में हमले की बात स्वीकार की, फिर भी साथ मौजूद अन्य लोगों पर कार्रवाई करने के बजाय बच्ची के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर दी गई, जो अदालत के पहले के आदेश के विपरीत है। वकील ने यह भी बताया कि बच्ची के आवास पर पथराव किए जाने के वीडियो सबूत मौजूद हैं और चार पुलिसकर्मी हमलावरों के साथ मौजूद थे, जिनके खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
गंभीरता से संज्ञान लेते हुए सीजेआई सूर्य कांत ने टिप्पणी की कि अगर बच्ची पर हमला करने वाले असामाजिक तत्व खुलेआम घूम रहे हैं और उसे डरा-धमका रहे हैं, तो यह एक गंभीर मामला है और इसमें दो राय नहीं हो सकती। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि बच्ची की सुरक्षा के लिए कदम उठाए जाएं और स्थानीय पुलिस इस मामले को स्वतंत्र रूप से देखे। जस्टिस बागची ने भी एफआईआर पर तुरंत कार्रवाई और यूपी पुलिस से पीड़िता व उसके परिवार को सुरक्षा दिए जाने की जरूरत बताई, साथ ही जांच पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने से कराए जाने पर ज़ोर दिया। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि वह बच्ची की सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए इस मुद्दे से पहले से अवगत हैं। बेंच ने मौखिक रूप से उत्तर प्रदेश और दिल्ली सरकार से एफआईआर, बच्ची व उसके परिवार की सुरक्षा व्यवस्था और हमले तथा धमकी में कथित रूप से शामिल लोगों के खिलाफ अब तक की गई कार्रवाई पर स्टेटस रिपोर्ट तलब की।
एक और शिकायत ने बढ़ाई पेचीदगी
इस बीच मामला और उलझ गया है। सुप्रीम कोर्ट की वकील अमिता सचदेवा ने दिल्ली के साइबर पुलिस स्टेशन में निशु आज़ाद और उनके पिता संजय कुमार के खिलाफ अलग शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें आरोप है कि निशु के एक्स (ट्विटर) अकाउंट से हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां पोस्ट की गईं। शिकायत में संजय कुमार को अभिभावक बताते हुए यह भी जांच की मांग की गई है कि क्या यह अकाउंट किसी नाबालिग द्वारा उनके घर से चलाया जा रहा था। हालांकि पुलिस के अनुसार, शनिवार तक इस शिकायत पर कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। इस तरह यह विवाद अब हमले, ऑनलाइन उत्पीड़न, जातिगत अपराध और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कई शिकायतों के साथ एक बड़ा विवादित मुद्दा बन चुका है।
आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब उत्तर प्रदेश और दिल्ली पुलिस को नाबालिग बच्ची और उसके परिवार की सुरक्षा तथा एफआईआर पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट यह देखेगा कि निर्देशों का पालन किस हद तक हुआ है।

