सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल का ऐलान, नोएडा डीएम मेधा रूपम पर हाईकोर्ट के कठोर आदेश को देंगे चुनौती

नई दिल्ली। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार (9 सितंबर 2026) को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि सरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देगी, जिसमें नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की कड़ी आलोचना करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय की 24-25 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत रद्द कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति की हेबियस कॉर्पस याचिका मंजूर करते हुए एनएसए डिटेंशन ऑर्डर रद्द कर दिया था। विस्तृत आदेश 7 सितंबर को सार्वजनिक हुआ। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने कहा कि डिटेंशन ऑर्डर और उसके आधार “बिना दिमाग लगाए” और बिना ठोस सामग्री के पारित किए गए थे। इससे आकृति के अनुच्छेद 21 के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां

कोर्ट ने मेधा रूपम के आचरण को “उपहास के योग्य” (worthy of derision) बताया। पीठ ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट में केवल आरोप थे, कोई विश्वसनीय सबूत नहीं। डीएम को रिकॉर्ड की गहन जांच करनी चाहिए थी और यह देखना चाहिए था कि सामान्य कानून पर्याप्त है या नहीं। कोर्ट ने आरोप लगाया कि डीएम ने आकृति को “उदाहरण” बनाकर दूसरों को मजदूरों के समर्थन में बोलने से रोकना चाहा।

पीठ ने चेतावनी दी कि अगर अफसरशाही का “तानाशाही” रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश “ऑर्वेलियन डिस्टोपिया” (Orwellian Dystopia) बन सकता है। अफसरों को याद दिलाया गया कि उनकी वफादारी संविधान के प्रति है, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं। कोर्ट ने आकृति को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। यह राशि डीएम मेधा रूपम और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों (एसएचओ तक) के वेतन से वसूली जाएगी। कोर्ट की नाराजगी इन अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज की जाएगी।

मामला क्या है?

आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहास स्नातक और लॉ की छात्रा हैं। अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के वेतन और कामकाजी परिस्थितियों को लेकर हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों में उन्हें गिरफ्तार किया गया। 11-12 अप्रैल को हिरासत में लिया गया। 13 मई को एनएसए लगाया गया। वे लगभग पांच महीने हिरासत में रहीं। कई एफआईआर में नाम है; कुछ में जमानत मिल चुकी है, लेकिन अन्य मामलों में अभी भी जेल में हैं। हाईकोर्ट ने राज्य की कहानी को “गढ़ा हुआ” बताया और पूछा कि आकृति को हिंसा के लिए कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जबकि वे हिंसा से पहले ही हिरासत में थीं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने एक अन्य मामले (ग्रेटर नोएडा में छात्र को नोटिस) की सुनवाई के दौरान संदर्भ आया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी जा रही है। मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री हैं। इस मामले ने प्रशासनिक जवाबदेही, निवारक हिरासत के दुरुपयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक चर्चा छेड़ दी है।

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