रियाद/सना/सिंगापुर, मध्य-पूर्व में छिड़ा युद्ध मंगलवार को एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया, जब यमन के ईरान-समर्थित हूथी विद्रोहियों ने अमेरिका के करीबी सहयोगी सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्से के चार शहरों पर ड्रोन और मिसाइलों से सीधा हमला बोल दिया। इस हमले में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 73 लोग घायल हुए हैं, और सऊदी तेल प्रतिष्ठानों में भीषण आग लग गई। छह महीने से चल रहे इस क्षेत्रीय संघर्ष में सऊदी अरब के खिलाफ यह अब तक के सबसे बड़े हमलों में से एक माना जा रहा है।
चार शहरों पर एक साथ हमला
हूथी विद्रोहियों ने दावा किया कि उन्होंने सऊदी क्षेत्र में गहराई तक एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। हमले में खामिस मुशैत शहर स्थित सऊदी एयरबेस को निशाना बनाया गया, वहीं पास के शहर अबहा में सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको से जुड़े ठिकानों पर भी हमला हुआ। इसके अलावा यमन सीमा से सटे नज़रान और लाल सागर के अहम बंदरगाह शहर जिज़ान को भी निशाना बनाया गया, जहां एक बड़ी रिफाइनरी और बिजलीघर स्थित है। सऊदी अधिकारियों ने इन जगहों पर आग लगने की पुष्टि की, हालांकि हमले के बाद की तस्वीरें फौरन सामने नहीं आ सकीं क्योंकि सऊदी अरब में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है।
जवाबी कार्रवाई में हूथी नियंत्रित मीडिया ने दावा किया कि सऊदी लड़ाकू विमानों ने यमन की राजधानी सना के पास जुबाह और दक्षिण-पश्चिमी ताइज़ प्रांत में कई हवाई हमले किए। इससे पहले सोमवार को हूथियों ने सऊदी सीमा के पास कुछ ट्रकों पर हमले की तस्वीरें भी जारी की थीं। गौरतलब है कि हाल के दिनों में सऊदी अरब समर्थित यमनी सरकारी सेनाओं ने हूथी-नियंत्रित इलाकों पर बहु-मोर्चा आक्रमण शुरू किया था, जिसके बाद हूथियों ने भी सरकार-नियंत्रित इलाकों पर आगे बढ़ने की कोशिश की थी। बारह साल पहले राजधानी सना से बाहर खदेड़ी गई यमनी सरकार अब पूरे हूथी-नियंत्रित क्षेत्र को वापस लेने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
आखिर हूथी अब तक युद्ध से दूर क्यों थे?
यह सवाल लंबे समय से चर्चा में रहा है कि जब ईरान के अन्य क्षेत्रीय सहयोगी लेबनान का हिज़्बुल्लाह और इराक की मिलिशिया — अमेरिका-इज़रायल की ईरान पर हमले के बाद छिड़े इस युद्ध में शामिल हो गए, तो भारी हथियारों से लैस और खाड़ी देशों तथा लाल सागर की नौवहन गतिविधियों को बुरी तरह बाधित करने में सक्षम हूथी अब तक मैदान में क्यों नहीं उतरे। हूथी आंदोलन उत्तरी यमन में हूथी परिवार के नेतृत्व वाला एक सैन्य, राजनीतिक और धार्मिक समूह है, जो शिया इस्लाम के ज़ैदी संप्रदाय से जुड़ा है। 2011 के “अरब स्प्रिंग” आंदोलन के बाद इस समूह ने अपनी ताकत बढ़ाई और ईरान से करीबी संबंध बनाए, और 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्ज़ा कर लिया। इसके अगले ही साल सऊदी अरब ने अरब देशों का एक गठबंधन बनाकर हूथियों को सत्ता से हटाने के लिए सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया था।
हालांकि ईरान हूथियों को अपने क्षेत्रीय “प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance) का हिस्सा मानता है, यमन मामलों के जानकारों का कहना है कि यह समूह मुख्य रूप से अपने घरेलू एजेंडे से प्रेरित है, भले ही उसकी ईरान और हिज़्बुल्लाह के साथ राजनीतिक निकटता रही हो। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने हिज़्बुल्लाह की मदद से हूथियों को हथियार, धन और प्रशिक्षण दिया है, जबकि हूथी खुद को ईरान का “प्रॉक्सी” मानने से इनकार करते हैं और दावा करते हैं कि वे अपने हथियार खुद विकसित करते हैं।
विश्लेषकों की राय बंटी हुई है कुछ का मानना है कि हूथी पहले भी पड़ोसी देशों में गुपचुप हमले कर चुके हैं, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि हूथी और ईरान जानबूझकर सही मौके का इंतज़ार कर रहे थे ताकि अधिकतम दबाव बनाकर युद्ध में उतरा जा सके। यमन मामलों के जानकारों के अनुसार तेहरान नहीं चाहता कि वह अपने सभी पत्ते एक साथ खोल दे, और वह हूथी समूह को आने वाले चरण के लिए बचाकर रख रहा है। मंगलवार का यह ताज़ा हमला इसी आशंका की पुष्टि करता दिख रहा है कि हूथियों का युद्ध में प्रवेश महज़ समय की बात थी।
हमले के बाद तेल बाज़ार में हलचल, फिर भी $100 का आंकड़ा नहीं टूटा
अगस्त महीने में एक महीने की शांति के बाद खाड़ी क्षेत्र में लड़ाई फिर तेज़ हो गई है, और ईरान तथा अमेरिका के बीच गोलीबारी का सिलसिला भी जारी है। इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाज़ार पर पड़ा है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत में करीब दो प्रतिशत की तेज़ी देखी गई, और यह जुलाई के अंत के बाद पहली बार करीब 99 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया, वहीं अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी जून की शुरुआत के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। दिलचस्प बात यह है कि भारी भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति में बड़ी बाधाओं के बावजूद तेल की कीमतें अभी तक 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार नहीं कर पाई हैं। रॉयटर्स की एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी कई वजहें हैं।
सबसे पहले, ईरान युद्ध शुरू होने से पहले खाड़ी क्षेत्र से करीब 1.8 करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल का निर्यात होता था, जो अब घटकर लगभग 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया है। हालांकि 30 अगस्त को दोबारा लड़ाई भड़कने से पहले होर्मुज़ जलडमरूमध्य से रोज़ाना करीब 80 से 90 लाख बैरल तेल गुज़र रहा था जो उससे पिछले हफ्ते के मुकाबले दोगुना था। विशेषज्ञों के अनुसार भले ही अब यह प्रवाह घटकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन से भी कम रह गया हो, लेकिन औसत निकासी अब भी 40 से 50 लाख बैरल प्रतिदिन के आसपास बनी हुई है, जो मौजूदा हालात में तेल की “उचित” कीमत करीब 95 डॉलर प्रति बैरल तय करती है।
दूसरी बड़ी वजह यह है कि खाड़ी के तेल निर्यातक देशों ने वैकल्पिक मार्ग और तरीके खोज लिए हैं। सऊदी अरामको ने अगस्त में खाड़ी के भीतर स्थित रास तनूरा पोर्ट से लदान फिर शुरू कर दी, हालांकि लाल सागर स्थित यानबू से होने वाला निर्यात अब भी ईरान-समर्थित हूथियों की समुद्री नाकाबंदी के कारण दबाव में है और मंगलवार का हमला इस दबाव को और बढ़ा सकता है। इसके अलावा अमेरिका, कनाडा, गुयाना और रूस ने भी गैर-ओपेक उत्पादन बढ़ाया है, और आपातकालीन भंडार जारी करने से भी बाज़ार में कुछ राहत मिली है। साथ ही चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते चलन और आयात में कमी से मांग पर भी असर पड़ा है, जिसने कीमतों पर दबाव को कुछ हद तक संतुलित रखा है। हालांकि बाज़ार जानकार आगाह कर रहे हैं कि हालात अब भी बेहद नाज़ुक हैं। आर्गस के मुख्य अर्थशास्त्री डेविड फाइफ के अनुसार भौतिक स्तर पर बाज़ार बेहद तंग स्थिति में है, और डीज़ल बाज़ार में तो साफ तौर पर कमी के संकेत दिख रहे हैं। इसी वजह से कई बड़े बैंकों ने अपने पूर्वानुमान बढ़ा दिए हैं मॉर्गन स्टैनली को उम्मीद है कि साल की चौथी तिमाही में औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकती है, जबकि गोल्डमैन सैक्स ने अपने ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों के पूर्वानुमान में 5 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी कर दी है।
आगे क्या?
मंगलवार का हमला इस बात का संकेत है कि छह महीने पुराना यह क्षेत्रीय संघर्ष अब सिर्फ ईरान-अमेरिका-इज़रायल तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यमन का मोर्चा भी पूरी तरह खुल चुका है। सऊदी अरब के दक्षिणी शहरों पर हमले और लाल सागर में नाकाबंदी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर आने वाले दिनों में और गहरा असर डाल सकती है, खासकर अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बाहर के इलाकों में भी हूथी हमले तेज़ होते हैं। विश्लेषकों की नज़र अब इस पर टिकी है कि क्या यह हमला हूथियों की एक बड़ी, लंबी सैन्य रणनीति की शुरुआत है, या फिर एक सीमित जवाबी कार्रवाई।
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