नोएडा। महर्षि आश्रम से जुड़े स्पिरिचुअल रीजेनरेशन मूवमेंट फाउंडेशन (SMRF) ट्रस्ट की करोड़ों रुपये की जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच लगातार आगे बढ़ रही है। इस मामले में कई आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हो चुकी है और विभिन्न राज्यों में उनकी संपत्तियां जांच के दायरे में हैं। वहीं दूसरी ओर नोएडा में इस पूरे प्रकरण ने नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली और उसकी कार्रवाई को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राधिकरण की कार्यशैली पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एक ओर किसानों और आम लोगों के खिलाफ अतिक्रमण या निर्माण संबंधी मामलों में तत्काल कार्रवाई की जाती है, जबकि दूसरी ओर विवादित जमीनों पर कथित रूप से अवैध प्लॉटिंग और निर्माण की शिकायतें लंबे समय तक जारी रहने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोप लगते रहे हैं।
ED की जांच में खुल रहे हैं नए तथ्य
महर्षि आश्रम ट्रस्ट की जमीन के कथित फर्जीवाड़े की जांच में ईडी पहले ही कई दस्तावेज जुटा चुकी है। जांच एजेंसी के अनुसार, फर्जी दस्तावेजों और कथित फर्जी पदाधिकारियों के माध्यम से ट्रस्ट की भूमि के सौदे किए गए। इस मामले में कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है और कई राज्यों में उनकी संपत्तियां जांच के दायरे में हैं।
हालांकि स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इस पूरे मामले में केवल जमीन बेचने वाले ही जिम्मेदार थे या फिर कथित तौर पर पूरे नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों की भूमिका की भी समान रूप से जांच होनी चाहिए।
विवादित जमीन पर अब भी प्लॉटिंग के आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि महर्षि आश्रम से जुड़ी विवादित भूमि के कुछ हिस्सों में अब भी छोटे-छोटे प्लॉट काटकर बेचने की गतिविधियां जारी हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी जमीन पर स्वामित्व विवाद या जांच चल रही हो, तो उस पर किसी भी प्रकार की खरीद-फरोख्त और निर्माण गतिविधि को समय रहते रोकना संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है।
प्राधिकरण की भूमिका पर उठ रहे सवाल
नोएडा प्राधिकरण पहले भी अपनी कार्यशैली को लेकर आलोचनाओं का सामना करता रहा है। समय-समय पर अवैध निर्माण, भू-माफियाओं की गतिविधियों और भूमि प्रबंधन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि शुरुआती स्तर पर प्रभावी कार्रवाई की जाती, तो विवादित जमीनों पर कथित फर्जी खरीद-फरोख्त और प्लॉटिंग को रोका जा सकता था।
समान कार्रवाई की उठ रही मांग
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि कानून का पालन सभी पर समान रूप से होना चाहिए। यदि किसी मामले में जांच एजेंसियां कार्रवाई कर रही हैं, तो स्थानीय प्रशासन और प्राधिकरण को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विवादित भूमि पर कोई नई अवैध गतिविधि न हो और यदि किसी व्यक्ति की भूमिका जांच में सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। महर्षि आश्रम भूमि प्रकरण अब केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह भूमि प्रबंधन, निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में ईडी की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।

