भारत और अमेरिका के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के बीच किसानों में चिंता तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्टों और किसान नेताओं के बयानों के आधार पर प्रतीत हो रहा है कि भारत-अमेरिका के संभावित अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Agreement) में कृषि उत्पादों पर शुल्क कटौती तथा निर्यात-आयात से जुड़ी जानकारियों के खुलासे शामिल हो सकते हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीयर की 23-24 जून की नई दिल्ली यात्रा के दौरान इस समझौते पर अंतिम चर्चा होने की संभावना बताई जा रही है, जिससे किसानों की भारी चिंता और असमंजस उभरा है।
किसानों की चिंताएं और आशंकाएं
कई किसान संगठन और राष्ट्रीय किसान यूनियन के नेता इस समझौते को लेकर आशंकित हैं। उनका कहना है कि यदि अमेरिका से आयात होने वाले कई कृषि और खाद्य उत्पादों पर भारतीय शुल्कों में कटौती की जाती है, तो भारतीय किसान अमेरिकी सब्सिडी प्राप्त सस्ते उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। विशेष रूप से डेयरी, पोल्ट्री, मक्का और कुछ तिलहनों के किसान इसे अपने लिए घातक मान रहे हैं। किसान नेताओं का यह भी कहना है कि समझौते के कारण आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) मक्का या अन्य ऐसी वस्तुएँ अप्रत्यक्ष रूप से भारत में प्रवेश कर सकती हैं, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और जैविक विविधता के लिए खतरा बन सकती हैं।
WTO और MSP पर दबाव
सूत्रों के अनुसार अमेरिकी पक्ष विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी भारत पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नीति में बदलाव का दबाव बना रहा है। किसान संगठन चेतावनी दे रहे हैं कि यदि MSP से संबंधित कोई समझौता या गुप्त सहमति अंतरिम समझौते का हिस्सा बनी तो यह लाखों धान और गेहूं उत्पादक किसानों के हितों के लिए घातक होगा। किसान नेताओं की दलील है कि MSP न सिर्फ किसानों की आमदनी सुनिश्चित करता है बल्कि खाद्य संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।
किसान नेताओं का रुख: सरकार से जवाब और कार्रवाई की माँग
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत और राष्ट्रीय महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वे किसानों के हितों की “पूरी तरह” रक्षा करने के अपने वादे पर कायम रहें और अमेरिका के दबाव में आ कर ऐसा कोई अंतरिम समझौता न करें जो देश के कृषि-उत्पादन और किसानों की आजीविका से समझौता करता हो। किसान नेता यह भी मांग कर रहे हैं कि सरकार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जानकारी दे कि किन-किन शर्तों पर चर्चा हो रही है, किन वस्तुओं पर आयात सीमा या शुल्क में कटौती प्रस्तावित है, और किस प्रकार के क्वालिटी-कंट्रोल या फाइटो-सैनेटरी मानक लागु किए जाएंगे।
राकेश टिकैत की ताज़ा टिप्पणी
राकेश टिकैत ने हाल में एक वीडियो बाइट में कहा कि यह समझौता “फेयर नहीं” और “प्रेशर वाला” है। टिकैत ने आरोप लगाया कि सरकार ने अमेरिका के डिक्लेरेशन के बाद न तो मीडिया को, न किसानों को, न ही जनता को कोई संतोषजनक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के किसानों में भय व्याप्त है — मक्का, सोयाबीन, तिलहन, दूध, और सेब उत्पादक सभी प्रभावित होंगे। टिकैत ने कहा कि यदि सरकार पारदर्शिता नहीं दिखाती और किसानों के सवालों का जवाब नहीं देती तो किसान आंदोलन के विकल्प के रूप में अपने अधिकार सुरक्षित रखेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि आंदोलन की तैयारी चल रही है और आगे की रणनीति 23 जून के बाद घोषित की जाएगी।
सरकार की भूमिका और पारदर्शिता पर दबाव
किसान नेताओं ने क्वालिटी कंट्रोल, कीटनाशक अवशेषों की जाँच और आयात-नियमन के तंत्रों पर भी सरकार से जवाब मांगा है। उनका तर्क है कि अगर विदेश से सस्ते और सब्सिडी प्राप्त उत्पाद बड़े पैमाने पर आयात हो गए तो घरेलू उत्पादकों की उपज बाजार में टिक नहीं पाएगी, उत्पादन घटेगा और किसान आर्थिक दबाव में आ जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह खाद्य संरक्षण और कृषि प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता नियंत्रित करने वाले संस्थानों को सक्रिय रखे और आवश्यक नीतिगत कवच प्रदान करे।
निजी और सार्वजनिक हितों के बीच संतुलन का सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में अक्सर बाज़ार पहुँच बढ़ाने और शुल्क में कमी पर जोर रहता है, जबकि कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में खास छूट और संक्रमणकालीन संरक्षण की आवश्यकता होती है। नीति विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी समझौते को अंतिम रूप देने से पहले व्यापक प्रभाव मूल्यांकन और सार्वजनिक परामर्श अनिवार्य होना चाहिए ताकि छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ने वाले प्रभावों का संतुलित आकलन हो सके।
आगे की संभावनाएँ
सरकार के उच्च सूत्रों का कहना है कि वार्ताओं में राष्ट्रीय हितों और संवेदनशील क्षेत्रों के संरक्षण का पूरा ध्यान रखा जा रहा है, परन्तु अभी तक कोई आधिकारिक विस्तृत घोषणा नहीं आई है। व्यापार समझौते की अंतिम रुपरेखा और उसमें शामिल कृषि-क्लॉज़ेस को लेकर पारदर्शिता की कमी से असंतोष बढ़ा है। किसान संघों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी चिंताओं का ठोस समाधान नहीं किया गया और समझौते की शर्तें देशहित के अनुरूप नहीं पाईं गईं तो वे सड़क पर उतरने, बड़े पैमाने पर विरोध और आंदोलन जैसी कार्रवाई करने को बाध्य होंगे।
निष्कर्ष
किसानों की चिंता स्पष्ट है: यदि अंतरिम समझौते में पर्याप्त प्रोटेक्शन न दिया गया और सस्ते, सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात का मार्ग खुला तो देश के छोटे और सीमांत कृषक गम्भीर आर्थिक संकट का सामना कर सकते हैं। सरकार पर दबाव है कि वह वार्ताओं में पूर्ण पारदर्शिता दिखाए, किसानों और संबंधित हितधारकों की सुनवाई करे और कृषि-क्षेत्र की आत्मनिर्भरता व खाद्य-सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाले प्रावधानों को प्राथमिकता दे।

