नोएडा प्राधिकरण का ₹117 करोड़ मुआवजा महाघोटाला, SIT जांच पूरी, फेज-1 थाने में FIR दर्ज, तीन अफसर और तीन बिचौलिए बने आरोपी, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चलेगी आगे की कार्रवाई

जिस नोएडा प्राधिकरण को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने कभी यह कड़ी टिप्पणी की थी कि यह संस्था “सर से पैर तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है,” उसी प्राधिकरण के भ्रष्टाचार की जड़ें अब सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हो गई हैं। नोएडा प्राधिकरण में अतिरिक्त मुआवजा वितरण से जुड़े 117 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की जांच करने वाली सुप्रीम कोर्ट-निर्देशित विशेष जांच टीम (SIT) ने अब अपनी जांच पूरी कर ली है और थाना फेज-1 नोएडा में तीन प्राधिकरण अफसरों तथा तीन बिचौलियों के विरुद्ध प्राथमिकी (FIR) दर्ज करा दी है। इस FIR की खास बात यह है कि इसके जांच अधिकारी (IO) के रूप में थाने का कोई नियमित अफसर नहीं बल्कि उसी SIT दल का एक राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) नियुक्त किया गया है, जो इस पूरे प्रकरण की निरंतरता और निष्पक्षता सुनिश्चित करेगा।

कहाँ से शुरू हुई यह कहानी

मामले की जड़ें तब उजागर हुईं जब सुप्रीम कोर्ट एक अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था और उस दौरान नोएडा के दो अधिकारियों तथा एक भूस्वामी के विरुद्ध दर्ज एक FIR सामने आई, जिसमें आरोप था कि बिना किसी कानूनी हक के सात करोड़ से अधिक का मुआवजा फर्जी तरीके से दिला दिया गया था। सितंबर 2023 में सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि यह कोई इकलौती घटना नहीं थी, बल्कि ऐसे अनेक मामले थे जिनमें नोएडा प्राधिकरण ने भूस्वामियों को उनके हक से कहीं अधिक मुआवजा दिया था और यह सब बाहरी दबाव में तथा लेन-देन के आधार पर हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट की पहल और SIT का गठन

सुप्रीम कोर्ट ने 23 जनवरी 2025 को एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया, जिसे यह जांच करने का काम सौंपा गया कि क्या नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों ने कुछ भूस्वामियों को अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण मुआवजा दिया। यह SIT तीन सदस्यीय टीम थी, जिसका नेतृत्व एक वरिष्ठ IPS अधिकारी कर रहे थे। इसे जांच करनी थी कि क्या भुगतान किया गया मुआवजा उससे अधिक था जिसके भूस्वामी हकदार थे, और यदि हां, तो इसके लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार थे। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन IPS अधिकारियों की एक नई SIT के गठन का आदेश दिया और यह भी कहा कि यह प्रक्रिया कम से कम कमिश्नर रैंक के एक पुलिस अधिकारी की निगरानी में चले, जो न्यायालय को समय-समय पर स्थिति रिपोर्ट भी देगा।

SIT को क्या मिला — 10% कमीशन का काला खेल

SIT ने जांच के दौरान प्राधिकरण से 31 फाइलें मंगवाईं, और फिर 16 और फाइलें। 1976 से 2017 तक के मुआवजा वितरण से जुड़े दस्तावेजों की भी समीक्षा की गई। SIT की प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अदालत के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने भूस्वामियों को फुलाए हुए मुआवजे दिलाने के बदले 10 प्रतिशत कमीशन वसूला। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने SIT के काम की गति को लेकर चिंता जताते हुए जांच का दायरा और बढ़ाया पिछले 10 से 15 वर्षों में जिन CEO और शीर्ष अधिकारियों ने निर्णायक पदों पर काम किया, उनकी भूमिका की भी जांच के निर्देश दिए गए।

FIR दर्ज — आरोपियों की पहचान और मामले का खुलासा

SIT की जांच पूरी होने के बाद अब थाना फेज-1 नोएडा में तीन प्राधिकरण अफसरों और तीन बिचौलियों के विरुद्ध FIR दर्ज की गई है। मामले में नोएडा अथॉरिटी के दो कानूनी अधिकारी दिनेश कुमार सिंह और वीरेंद्र सिंह पहले से ही संदेह के घेरे में थे। अब इन आरोपों की औपचारिक आपराधिक पुष्टि FIR के रूप में हो चुकी है। इस FIR की एक अहम विशेषता यह है कि इसकी जांच थाने के किसी साधारण पुलिस अफसर के हाथ नहीं है, बल्कि उसी SIT दल के गज़टेड अफसर को I(Investigating Officer) नामित किया गया है। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि जांच में किसी बाहरी दबाव या हेरफेर की संभावना न रहे और सुप्रीम कोर्ट को सीधे जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

सुप्रीम कोर्ट की सतत निगरानी

इस मामले की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया इस जांच की लगातार निगरानी कर रहा है और जवाबदेही सुनिश्चित करने को लेकर कठोर रुख अपना रखा है। अगली सुनवाई 13 जुलाई के लिए निर्धारित की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान जिन किसानों या भूस्वामियों को अधिक मुआवजा मिला उनके विरुद्ध बिना न्यायालय की अनुमति के कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।

भ्रष्टाचार की इस जड़ की गहराई

यह SIT टीम पिछले 10 साल में अधिकारियों और उनके परिवार की संपत्तियों की भी जांच कर रही है, ताकि किसानों और अधिकारियों के बीच की मिलीभगत की पूरी सच्चाई सामने आ सके। यह खुलासा महज एक घोटाले की कहानी नहीं है यह उस संस्थागत सड़न की दास्तान है जो दशकों से सरकारी ढांचे में पलती रही और जिसे उजागर करने के लिए देश की सर्वोच्च न्यायपालिका को खुद मैदान में उतरना पड़ा।

आगे क्या

FIR दर्ज होने के बाद अब गिरफ्तारी, संपत्तियों की कुर्की और विभागीय कार्रवाई अगले चरण होंगे। सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में चल रही यह जांच देश के सबसे बड़े शहरी विकास प्राधिकरणों में से एक के चेहरे से नकाब उतारने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। नोएडा प्राधिकरण में यह कोई पहला घोटाला नहीं है — लेकिन पहली बार किसी जांच एजेंसी ने इतनी गहराई से फाइलें खोली हैं और सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने दोषियों को कटघरे में खड़ा किया है।

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