उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था और जेल प्रणाली की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। एक तरफ जहां 2010 के डकैती मामले में 16 साल तक जेल में बंद रहने वाले एक आरोपी ने गुनाह कबूल कर 8 साल की सजा पाई और रिहाई की राह देख रहा है, वहीं दूसरी ओर 13 अप्रैल के श्रमिक आंदोलन में गिरफ्तार 16 वर्षीय नाबालिग दो महीने से कासना जेल में वयस्क कैदियों के साथ बंद है, क्योंकि 50 हजार रुपये का बॉन्ड नहीं भर सका। दोनों घटनाएं न्याय की देरी, विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा और किशोर न्याय व्यवस्था की खामियों को उजागर करती हैं।
16 साल जेल काटने के बाद गुनाह कबूलने वाली कहानी
गौतम बुद्ध नगर के जयदीप देवघरिया के अनुसार, रिहान नामक व्यक्ति पर सेक्टर 39 पुलिस स्टेशन में 27 जुलाई 2010 को आईपीसी धारा 395 (डकैती) के तहत केस दर्ज हुआ था। आरोप था कि रिहान और उसके साथियों ने सेक्टर 41 के एक घर में घुसकर गहने, 22,000 रुपये नकद, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य सामान लूट लिया। पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की, लेकिन केस 2015 में सेशन कोर्ट पहुंचने के बाद 11 साल तक 12 अदालतों के बीच ट्रांसफर होता रहा। इस दौरान 157 सुनवाइयां हुईं। रिहान ने कभी जमानत नहीं मांगी। 30 सितंबर 2024 को शिकायतकर्ता नजबुल हसन की गवाही के बाद उसने गुनाह कबूलने की इच्छा जताई। मंगलवार को एडिशनल सेशन कोर्ट ने उसे 8 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। आईपीसी में इस धारा के तहत अधिकतम 10 साल की सजा का प्रावधान है, लेकिन रिहान पहले ही 16 साल जेल में बिता चुका है। अदालत के फैसले के बाद वह जल्द रिहा होने वाला है। यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मुकदमों की समस्या को रेखांकित करता है। देशभर में हजारों विचाराधीन कैदी अपनी संभावित सजा से ज्यादा समय जेल में बिता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और सरकार की ओर से समय-समय पर ऐसे कैदियों को राहत देने के निर्देश दिए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है।
नाबालिग कैदी की जेल यात्रा
दूसरी घटना और भी चौंकाने वाली है। नोएडा में 13 अप्रैल को हुए श्रमिक आंदोलन के मामले में गिरफ्तार 16 वर्षीय किशोर 14 अप्रैल से कासना जेल में बंद है। अदालत ने उसे जमानत दे दी, लेकिन 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदार पेश न कर पाने के कारण वह रिहा नहीं हो सका। किशोर की उम्र को लेकर संदेह होने पर अदालत ने 30 अप्रैल को मेडिकल परीक्षण कराया। 6 जून को रिपोर्ट में उम्र 16 वर्ष (जन्मतिथि 1 जनवरी 2010) पाई गई, जो आधार कार्ड से भी सत्यापित है। किशोर के वकील माणिक गुप्ता के अनुसार, अब किशोर न्याय अधिनियम के तहत आवेदन दायर किया गया है। इस कानून के मुताबिक, नाबालिगों को विशेष सुरक्षा मिलनी चाहिए और जमानत आसानी से दी जानी चाहिए, भले ही जमानतदार उपलब्ध न हों।
जेल प्रणाली पर सवाल
कासना जेल पहले भी सुर्खियों में रही है। पुरानी खबरों में यहां कैदियों से रिश्वत वसूली के आरोप लगे थे। दोनों मामलों में जेल प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया की सुस्ती साफ दिखती है। एक नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ रखना किशोर न्याय अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है।
विशेषज्ञों की राय: सामाजिक कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि विचाराधीन कैदियों की संख्या कम करने के लिए तेज ट्रायल, नियमित जमानत समीक्षा और किशोरों के लिए अलग सुविधाएं जरूरी हैं। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया है, जहां कैदी अपनी सजा से ज्यादा समय जेल में बिता चुके थे। ये घटनाएं न केवल प्रभावित व्यक्तियों के जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती हैं। जिला प्रशासन और जेल अधिकारियों को इन मामलों में त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए ताकि निर्दोष या नाबालिग व्यक्ति अनावश्यक यातना से बच सकें। जय हिन्द जनाब डिजिटल लगातार ऐसे मुद्दों पर नजर रखे हुए है और आगे भी अपडेट देता रहेगा।

