परिसीमन बिल पर NDA की नई रणनीति, TMC विद्रोह और DMK की नाराज़गी से खुला ‘जादुई आँकड़े’ का रास्ता, मानसून सत्र में फिर होगा बड़ा दाँव

BJP ने किए अहम संगठनात्मक बदलाव, NDA विस्तार की भी तैयारी

अप्रैल के विशेष संसद सत्र में करारी हार के बाद भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) एक बार फिर परिसीमन बिल को संसद में पारित कराने के लिए बड़ी रणनीतिक चाल चलने की तैयारी में है। जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होने वाले मानसून सत्र को सरकार ने अपना अगला बड़ा मौका माना है, और इस बार विपक्षी खेमे में पड़ी दरारों ने भाजपा के हौसले को और बुलंद कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

अप्रैल 2026 में संसद के विशेष सत्र में पेश संविधान (एक सौ इकतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2026 — जिसे आमतौर पर परिसीमन बिल के नाम से जाना जाता है, 2011 की जनगणना के आधार पर चुनावी क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करने के उद्देश्य से लाया गया था। यह बिल दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया। इस संविधान संशोधन बिल में लोकसभा की अधिकतम सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान है। साथ ही इसका मकसद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना भी है, वह वादा जो वर्षों से अधूरा पड़ा है।

अप्रैल में क्यों हारी सरकार?

लोकसभा की कुल स्वीकृत संख्या 543 है, लेकिन इस समय तीन सीटें बशीरहाट, शिलांग और नौगाँव — रिक्त हैं, जिससे दो-तिहाई बहुमत की सीमा घटकर 360 हो गई है। फिलहाल NDA के पास लोकसभा में केवल 293 सांसदों का समर्थन है। यानी सरकार को जीत के लिए अभी भी करीब 67 अतिरिक्त वोटों की ज़रूरत है। अप्रैल में हुए मतदान के दौरान 528 सांसद उपस्थित थे और दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 मतों की आवश्यकता थी। सरकार को 298 वोट मिले जबकि 230 विरोध में पड़े, 54 मतों के अंतर से बिल गिर गया।

अब क्या बदला है? TMC और DMK का समीकरण

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुए आंतरिक विद्रोह ने एक बार फिर यह संभावना जगाई है कि NDA सरकार मानसून सत्र में परिसीमन बिल को दोबारा पेश कर सकती है। सूत्रों के अनुसार यदि TMC के 20 सांसद NDA के पक्ष में मतदान करते हैं तो यह आँकड़ा 313 तक पहुँच जाएगा। और यदि इसके साथ DMK के 22 सांसद भी समर्थन दें तो यह संख्या 335 हो जाएगी। इसके अलावा उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के नौ सांसदों में से छह का समर्थन मिलने पर यह आँकड़ा 341 तक पहुँच सकता है। हालाँकि यह अभी भी दो-तिहाई बहुमत से कम है, लेकिन राज्यसभा में भी NDA की स्थिति जल्द मज़बूत होने की संभावना है।

BJP की संगठनात्मक तैयारी

सिर्फ संसदीय गणित ही नहीं, BJP ने ज़मीनी स्तर पर भी बड़ी तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा ने 1 जून को दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में एक व्यापक रणनीति बैठक आयोजित की, जिसकी अध्यक्षता नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने की। इसमें पार्टी पदाधिकारी और वरिष्ठ कार्यकर्ता शामिल हुए और बैठक संगठनात्मक विस्तार एवं जमीनी पुनर्गठन पर केंद्रित रही। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने बताया कि मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस बैठक में देश के कोने-कोने में संगठन को और मज़बूत करने की योजना बनाई गई। NDA इस समय 22 राज्यों में सत्ता में है।

NDA का विस्तार: दक्षिण भारत पर नज़र

परिसीमन का सबसे संवेदनशील पहलू दक्षिण भारत से जुड़ा है। चूँकि BJP और NDA उन राज्यों में विशेष रूप से मज़बूत हैं जहाँ प्रतिनिधित्व कम है, इसलिए जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण से इन्हें लाभ होगा। दूसरी ओर तमिलनाडु और केरल जो सबसे ज़्यादा सीटें खो सकते हैं ऐसे राज्य हैं जहाँ BJP का ऐतिहासिक रूप से आधार कमज़ोर रहा है। तमिलनाडु में AIADMK ने 2026 विधानसभा चुनावों से पहले NDA का आधार बढ़ाने के लिए DMDK और PMK से बातचीत शुरू की है।

विपक्ष का रुख

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने बिल पर आरोप लगाया है कि 2011 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाकर दक्षिण भारत के लोगों का हक छीना जा रहा है। विपक्ष का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया, उन्हें संसद में प्रतिनिधित्व की कीमत चुकानी पड़ेगी।

आगे की राह

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन बिल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे जटिल संवैधानिक प्रश्नों में से एक है। यह केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति के भौगोलिक पुनर्वितरण का सवाल है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए उसे न केवल अपने सहयोगियों को साथ रखना होगा, बल्कि विपक्षी खेमे से भी पर्याप्त संख्या जुटानी होगी। TMC का आंतरिक संकट और DMK का कांग्रेस से बढ़ता तनाव ये दोनों घटनाक्रम BJP के लिए एक अप्रत्याशित अवसर बनकर सामने आए हैं। जुलाई का मानसून सत्र तय करेगा कि क्या मोदी सरकार इस ऐतिहासिक बिल को पारित कराने में सफल हो पाती है या यह मुद्दा 2029 के आम चुनावों तक एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना रहेगा।

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