घटती जन्मदर, बढ़ता अकेलापन और जनसांख्यिकीय संकट की चेतावनी; भारत भी अब अछूता नहीं
मानव इतिहास में पहली बार एक ऐसी स्थिति आ खड़ी हुई है जहाँ दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों की आबादी खुद को पुनर्स्थापित करने में असमर्थ होती जा रही है। जन्मदर गिर रही है, विवाह की संस्था कमज़ोर पड़ रही है, अकेलापन एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है और परिवार जिसे मानव सभ्यता की नींव कहा जाता है उखड़ता नज़र आ रहा है। यह संकट न किसी एक देश का है, न किसी एक विचारधारा का यह सभ्यतागत संकट है, और इसके मूल में दो परस्पर विरोधी परंतु समान रूप से विनाशकारी विचारधाराएं हैं: पूंजीवाद और साम्यवाद।
विश्व की प्रजनन दर: प्रतिस्थापन स्तर से नीचे
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट (AEI) समेत दर्जनों वैश्विक शोध संस्थानों की ताज़ा रिपोर्टें एक भयावह तस्वीर पेश कर रही हैं। वर्तमान में वैश्विक कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जा चुकी है अर्थात् दीर्घकालिक जनसंख्या स्थिरता के लिए आवश्यक प्रति महिला लगभग 2.18 बच्चों के स्तर से नीचे। 1950 के दशक में यह दर लगभग 4.9 थी, जो 2023 तक घटकर लगभग 2.3 पर आ गई है। जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का कहना है कि 2024 में प्रजनन दर 2023 से भी कम थी और 2025 में 2024 से भी कम। उनके अनुसार अगले 20 से 30 वर्षों तक यह गिरावट लगभग तय है। यदि यह संकट नहीं थमा, तो अमेरिका जैसे देश को भी भीषण आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। 2025 से 2050 के बीच जनसंख्या में गिरावट का सामना कर रहे देशों में 65 वर्ष से अधिक आयु की आबादी की हिस्सेदारी लगभग दोगुनी होकर 17.3 प्रतिशत से 30.9 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी।
भारत: ‘सबसे अधिक आबादी’ का तमगा, लेकिन प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे
भारत को अब भी जनसंख्या विस्फोट की समस्या से जूझता देश माना जाता है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। UNFPA की ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) अब 2.0 पर आ गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। महज दो दशक पहले यह दर 2.9 थी, और आज घटकर 2.0 पर आ गई है। देश के दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में TFR पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे जा चुकी है। अनुमान है कि 2035 तक आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब और जम्मू-कश्मीर समेत कम से कम सात प्रमुख राज्यों की TFR 1.5 तक पहुंच जाएगी। UNFPA की रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है — भारत में एक तरफ तीन में से एक वयस्क (36%) अनचाहे गर्भ का सामना करता है, वहीं 30% लोग उतने बच्चे नहीं पा रहे जितने वे चाहते हैं। इस विरोधाभास से साफ है कि संकट केवल संख्याओं का नहीं, प्रजनन स्वायत्तता और सामाजिक ढांचे का है।
दक्षिण कोरिया: सभ्यता का ज़िंदा प्रयोगशाला
अगर किसी देश को परिवार के विघटन का सबसे तीखा उदाहरण मानना हो, तो दक्षिण कोरिया का नाम सबसे पहले आता है। 1970 के दशक से लगातार गिरती जन्मदर 2018 में 0.98 पर आई पहली बार यह एक से नीचे गई। 2024 तक यह दर 0.75 तक गिर गई, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कहीं नीचे है। दक्षिण कोरिया में अविवाहित माताएं अभी भी काफी असामान्य हैं, इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि ‘विवाह में गिरावट का सीधा अर्थ है प्रजनन दर में गिरावट।’ 2060 तक वहाँ स्वास्थ्य, दीर्घकालिक देखभाल और पेंशन की लागत GDP के 17.4 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए 2005 से अब तक भारी भरकम राशि खर्च की, लेकिन बैंक ऑफ कोरिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2040 के दशक तक देश स्थायी मंदी की चपेट में आ सकता है।
चीन और जापान: जनसांख्यिकीय आत्महत्या की राह पर
चीन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और यूक्रेन में TFR 1.0 से भी नीचे आ गई है। यदि यही गति जारी रही, तो चीन इस सदी के अंत तक 60 करोड़ से अधिक लोगों को खो सकता है। चीन ने जन्मदर बढ़ाने के लिए जनवरी 2026 से कंडोम पर 13 प्रतिशत कर लगाया है और तीन साल से कम उम्र के प्रत्येक बच्चे के लिए माता-पिता को सालाना 3600 युआन (करीब 500 डॉलर) देने की योजना शुरू की है। यह नीतियां इस बात का प्रमाण हैं कि सरकारें अब घबराहट में कदम उठा रही हैं।
अकेलापन महामारी: परिवार की जगह क्या है?
परिवार के टूटने का सबसे तात्कालिक परिणाम अकेलापन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की जून 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति स्थायी अकेलेपन का शिकार है और यह अकेलापन हर घंटे लगभग 100 मौतों का कारण बन रहा है। 2023 में अमेरिका के सर्जन जनरल ने आधिकारिक रूप से अकेलेपन को राष्ट्रीय महामारी घोषित किया था। दो साल बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ है आर्थिक दबाव, स्क्रीन की लत, दूरस्थ कार्य और बिखरते समुदाय इस संकट को और गहरा कर रहे हैं। 18 से 34 वर्ष के युवाओं में अकेलेपन की समस्या अधिक गंभीर है वैश्विक स्तर पर 19 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 27 प्रतिशत युवा वयस्क अकेलेपन का अनुभव करते हैं।
दो विचारधाराएं, एक ही अंजाम
यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है इस संकट की जड़ें कहाँ हैं? समाजशास्त्री और इतिहासकार इसके दो प्रमुख स्रोत बताते हैं। साम्यवाद की प्रत्यक्ष चोट: कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने परिवार को वर्ग असमानता की संस्था बताया और उसे राज्य के हितों के अधीन करने की वकालत की। सोवियत संघ में तलाक के कानून सरल किए गए, सामूहिक संस्थाओं को बढ़ावा दिया गया और माओ के चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों को खुलेआम चुनौती दी गई। उद्देश्य था कि नागरिक की पहली निष्ठा परिवार की जगह राज्य के प्रति हो। पूंजीवाद की धीमी परंतु गहरी खुरचन: पूंजीवाद ने कभी परिवार पर प्रत्यक्ष हमला नहीं किया, लेकिन उसके मूल्यों व्यक्तिगत स्वतंत्रता, तात्कालिक संतुष्टि और उपभोक्तावाद ने परिवार की बुनियाद को धीरे-धीरे खोखला कर दिया। विवाह अब आजीवन प्रतिबद्धता नहीं, ‘पर्सनल च्वाइस’ बन गई। बच्चे पालना ‘कॉस्ट-बेनिफिट’ का विषय हो गया। जैसे-जैसे देश अधिक समृद्ध हुए, महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर मिले और परिवार दो-आय पर निर्भर होते गए, प्रत्येक बच्चे के लिए पारिवारिक आय का त्याग बड़ा होता गया और इसने प्रजनन दर को नई निचाइयों तक धकेल दिया।
सभ्यता की कीमत
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल जनसांख्यिकीय समस्या नहीं है, इसके दूरगामी सभ्यतागत परिणाम होंगे। पहला, कामकाजी उम्र की आबादी घटेगी जिससे पेंशन और स्वास्थ्य प्रणालियों पर असहनीय बोझ पड़ेगा। दूसरा, बुजुर्गों की देखभाल परिवार की जगह राज्य को करनी पड़ेगी जो एक बड़ा आर्थिक भार बनेगा। तीसरा और सबसे गहरा नुकसान, बिना परिवार के समाज दीर्घकालिक सोच खो देता है। मंदिर, विश्वविद्यालय, इंफ्रास्ट्रक्चर ये सब इसलिए बनते हैं क्योंकि समाज भविष्य की पीढ़ियों के लिए सोचता है। चीन में 2026 में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, 2012 में लगभग 5 प्रतिशत युवा महिलाएं बच्चे नहीं चाहती थीं, जबकि 2023 तक यह आंकड़ा 47 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह संख्या केवल एक देश की नहीं, एक वैश्विक मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है।
क्या रास्ता है?
UNFPA की रिपोर्ट स्पष्ट कहती है कि समस्या केवल कम बच्चों की संख्या नहीं, बल्कि लोगों की इच्छा और वास्तविकता के बीच की खाई है। नीति-निर्माताओं को ऐसे ढांचे बनाने होंगे जिनमें परिवार चलाना और करियर बनाना साथ-साथ संभव हो। सांस्कृतिक स्तर पर भी पुनर्विचार ज़रूरी है त्याग, धैर्य और सामूहिकता को पुनः मूल्य देना होगा। समाजशास्त्री याद दिलाते हैं कि मनुष्य अलग-थलग नहीं, परिवार और समूह में विकसित हुआ है। परिवार केवल एक निजी संस्था नहीं वह भावनात्मक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक आधारशिला है। न पूंजीवाद ने और न साम्यवाद ने परिवार को बचाया एक ने राज्य के नाम पर, दूसरे ने बाज़ार के नाम पर उसे कमज़ोर किया। आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी क्रांति की बातें होती हैं, सबसे बड़ा सवाल यही है इन उपलब्धियों का वारिस कौन होगा, अगर अगली पीढ़ी ही नहीं बचेगी? सभ्यता की वह ‘लोड बियरिंग वॉल’, जो परिवार है, दरकती जा रही है। इसे संभालने का वक्त अभी है कल बहुत देर हो चुकी होगी।

