हॉर्मुज संकट के बीच भारत लैटिन अमेरिका और अफ्रीका की ओर मुड़ा, लेकिन पेट्रोल-डीजल महंगे,  कच्चे तेल सस्ता, पंप पर बोझ बढ़ा

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधा के कारण भारत ने अपनी ऊर्जा आयात रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। देश अब लैटिन अमेरिका (विशेषकर वेनेजुएला और ब्राजील) तथा अफ्रीकी देशों (नाइजीरिया, अंगोला आदि) से अधिक कच्चा तेल खरीद रहा है। लेकिन वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से नीचे आने के बावजूद घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे आम उपभोक्ता पर बोझ बढ़ गया है।

हॉर्मुज संकट का असर

फरवरी-मार्च 2026 में ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज विश्व के लगभग 20% तेल व्यापार का मार्ग प्रभावी रूप से बाधित हो गया। इस चोकपॉइंट से रोजाना 20 मिलियन बैरल से अधिक तेल गुजरता है। परिणामस्वरूप मध्य पूर्व से भारत को होने वाले आयात में भारी कमी आई। भारत अपनी कुल कच्चे तेल जरूरत का लगभग 85-88% आयात करता है, जिसमें मध्य पूर्व की हिस्सेदारी पहले बहुत बड़ी थी। इस संकट के जवाब में भारत ने तेजी से वैकल्पिक स्रोत तलाशे। रॉयटर्स और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, मई 2026 में वेनेजुएला भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। इस माह वेनेजुएला से 12 मिलियन बैरल से अधिक तेल भारत पहुंचने वाला है फरवरी 2020 के बाद सबसे अधिक। ब्राजील, गुयाना, नाइजीरिया, अंगोला, घाना और यहां तक कि इक्वाडोर व गैबॉन जैसे नए स्रोतों से भी आयात बढ़ा है। रूस से आयात भी जारी है, जिसमें अमेरिका की अस्थायी छूट मददगार साबित हुई।

कच्चा तेल सस्ता, पेट्रोल-डीजल क्यों महंगे?

वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें हाल ही में $100 प्रति बैरल से नीचे आ गई हैं, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें मई के दौरान कई बार बढ़ाई जा चुकी हैं। 15 मई को राज्य-owned तेल कंपनियों ने चार साल में पहली बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। उसके बाद और बढ़ोतरी हुई, जिससे दिल्ली में पेट्रोल ₹102 प्रति लीटर के आसपास पहुंच गया।

इस मिसमैच के मुख्य कारण:

पिछले नुकसान की भरपाई: संकट की शुरुआत में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ($120+ प्रति बैरल) के कारण तेल कंपनियां भारी घाटे में चली गईं। अब वे कुछ नुकसान वसूल रही हैं।

कमजोर रुपया: डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी से आयात महंगा पड़ रहा है।

भारी टैक्स: पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी और VAT का बोझ पहले से ही अधिक है।

भू-राजनीतिक जोखिम: आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता बनी हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, तेल कंपनियां अभी भी पूर्ण लागत पास नहीं कर पा रही हैं, लेकिन उपभोक्ता स्तर पर राहत नहीं मिल रही।

अर्थव्यवस्था पर असर

यह संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति दोनों को चुनौती दे रहा है। तेल आयात बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है। सरकार ने ईंधन संरक्षण, WFH और आयात नियंत्रण जैसे उपायों की अपील की है। साथ ही, रणनीतिक पुनर्गठन के तहत अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे दूर के स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाई जा रही है, जो लंबी अवधि में विविधीकरण की दिशा में सकारात्मक है लेकिन शिपिंग लागत बढ़ा रहा है।

विश्लेषकों का मत: यदि हॉर्मुज में स्थिति सामान्य नहीं हुई तो ऊर्जा कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर परिवहन, खाद्य वस्तुओं और समग्र मुद्रास्फीति पर पड़ेगा। विपक्ष सरकार पर महंगाई का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार वैश्विक परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहरा रही है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति याद दिलाती है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी देना और आपूर्ति स्रोतों का और अधिक विविधीकरण कितना जरूरी है। फिलहाल, आम आदमी पेट्रोल पंप पर महंगाई का असर महसूस कर रहा है, जबकि कच्चा तेल बाजार कुछ राहत दे रहा है।

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