नॉर्वे की वरिष्ठ पत्रकार हेला लिंग (Helle Lyng Svendsen) ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय राजकीय दौरे के दौरान सवाल पूछकर सुर्खियां बटोरी हैं। ‘डाग्सएविसेन’ (Dagsavisen) अखबार से जुड़ीं लिंग ने संयुक्त प्रेस अपीयरेंस के बाद मोदी से पूछा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते?” प्रधानमंत्री बिना जवाब दिए वहां से चले गए, जिसके बाद यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और भारत में राजनीतिक बहस छिड़ गई। मोदी 18-19 मई 2026 को नॉर्वे की यात्रा पर थे 43 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली राजकीय यात्रा। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे के साथ संयुक्त बयान के बाद प्रेस कार्यक्रम में कोई प्रश्नोत्तर सत्र नहीं रखा गया था। लिंग ने दावा किया कि उन्हें पहले से पता था कि सवाल नहीं लिए जाएंगे, लेकिन “ताकतवर देश के नेता से सवाल पूछना” उनका कर्तव्य था। उन्होंने विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (Press Freedom Index) का हवाला देते हुए कहा कि नॉर्वे पहले स्थान पर है जबकि भारत 157वें स्थान पर।
दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखी नोकझोंक
घटना के बाद भारतीय दूतावास ने लिंग को शाम की प्रेस ब्रीफिंग में आमंत्रित किया, जहां विदेश मंत्रालय के सचिव सी.बी. जॉर्ज और प्रवक्ता रणधीर जायसवाल मौजूद थे। लिंग ने मानवाधिकार उल्लंघनों, प्रेस की आजादी और “भारत पर भरोसा क्यों करें?” जैसे सवाल पूछे। जब उन्होंने फॉलो-अप सवालों की कोशिश की तो जॉर्ज ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा, “यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है, कृपया बीच में न टोकें।” लिंग ने बाद में कहा कि उन्हें पूर्ण जवाब नहीं मिला और चर्चा वैक्सीन, योग व सांस्कृतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर चली गई।लिंग ने बीबीसी हिन्दी को दिए इंटरव्यू में कहा, “जब कोई ताकतवर देश का नेता हमारे छोटे से देश में आता है तो सवाल पूछना हमारी जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सबसे ताकतवर व्यक्ति से सवाल पूछने की गुंजाइश होनी चाहिए।” उन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टों पर भरोसा जताया और भारत में पत्रकारिता को “जोखिम भरा काम” बताया।
भारत में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस ने इस घटना को उठाते हुए सरकार पर “सवालों से बचने” का आरोप लगाया। राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने प्रेस स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए। वहीं, सरकार समर्थकों ने लिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और इसे “एंटी-इंडिया प्रोपगैंडा” करार दिया। कुछ ने उन्हें विपक्ष का “एजेंट” तक बताया। भारतीय दूतावास ने लिंग को ब्रीफिंग में बुलाकर जवाब देने की कोशिश की, लेकिन विवाद थमा नहीं। लिंग ने बाद में दावा किया कि उनके इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट सस्पेंड कर दिए गए, जिस पर सोशल मीडिया पर और बहस हुई।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
नॉर्वे में प्रेस कार्यक्रमों में आमतौर पर नेता सवाल लेते हैं। लिंग ने उदाहरण दिया कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के दौरान भी कुछ सवाल लिए गए थे। भारत में पीएम मोदी विदेश दौरे पर बहुत कम ही प्रेस के सवाल लेते हैं—अब तक सिर्फ दो मौकों पर ऐसा हुआ है। यह घटना भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग, मानवाधिकारों और मीडिया स्वतंत्रता पर वैश्विक बहस को फिर से छेड़ गई है। नॉर्वे दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस वाले देशों में शुमार है, जबकि भारत हाल के वर्षों में सूचकांक में नीचे खिसका है।
दोनों पक्षों के नजरिए
सरकार का पक्ष है कि कार्यक्रम में पहले से कोई प्रश्नोत्तर सत्र तय नहीं था और संयुक्त बयान के बाद दोनों नेता निकल गए। विपक्ष और कुछ अंतरराष्ट्रीय आवाजें इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल के रूप में देख रही हैं। लिंग ने स्पष्ट किया कि वे भारत की संस्कृति, योग और पर्यावरण पहलों की सराहना करती हैं, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाबदेही पर सवाल उठाना उनका काम है। यह विवाद भारत-नॉर्वे संबंधों को प्रभावित करने वाला नहीं माना जा रहा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप, क्लीन एनर्जी, ब्लू इकोनॉमी और इंडो-पैसिफिक सहयोग जैसे मुद्दों पर समझौते हुए हैं। लेकिन प्रेस स्वतंत्रता और जवाबदेही पर बहस जारी रहेगी।

