इस्लामी कैलेंडर का बारहवाँ और आख़िरी महीना ज़िलहिज्जा बहुत ही बरकतों और रहमतों वाला महीना माना जाता है। यह महीना हज, कुर्बानी और अल्लाह की इबादत से जुड़ा हुआ है। दुनिया भर के मुसलमान इस महीने का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। ज़िलहिज्जा हमें त्याग, सब्र, भाईचारे और अल्लाह की फ़रमांबरदारी का संदेश देता है। ज़िलहिज्जा के पहले दस दिन इस्लाम में बहुत अधिक महत्वपूर्ण माने गए हैं। हदीसों में आया है कि इन दिनों में की गई नेकियाँ अल्लाह को सबसे अधिक प्रिय होती हैं। इसलिए मुसलमान इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा नमाज़, रोज़ा, तिलावत-ए-कुरआन, ज़िक्र और दुआ का एहतमाम करते हैं। रसूलुल्लाह ने फरमाया कि अल्लाह के यहाँ इन दस दिनों में किए गए अच्छे काम सबसे ज्यादा पसंदीदा हैं। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह इन दिनों को इबादत और नेक कामों में गुज़ारे। इन दस दिनों में सबसे खास दिन यौम-ए-अरफ़ा यानी 9 ज़िलहिज्जा का होता है। हाजी इस दिन मैदान-ए-अरफ़ात में जमा होकर अल्लाह से दुआ करते हैं। जो लोग हज पर नहीं होते, उनके लिए इस दिन का रोज़ा रखना बहुत सवाब का काम माना गया है। कहा गया है कि अरफ़ा के दिन का रोज़ा पिछले और अगले साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बनता है। 10 ज़िलहिज्जा को ईद-उल-अज़हा मनाई जाती है, जिसे बकरीद भी कहा जाता है। यह हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानी की याद में मनाई जाती है। अल्लाह के हुक्म पर हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने अपने बेटे की कुर्बानी देने का इरादा किया, लेकिन अल्लाह ने उनकी नीयत और फ़रमांबरदारी देखकर एक जानवर कुर्बानी के लिए भेज दिया। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें अल्लाह के हर हुक्म का पालन करना चाहिए। ज़िलहिज्जा का महीना हमें इंसानियत, त्याग, बराबरी और अल्लाह से मोहब्बत का पैगाम देता है। हमें चाहिए कि हम इस महीने और खासकर पहले दस दिनों की कद्र करें, इबादत करें, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करें और अपने जीवन को नेक रास्ते पर चलाने की कोशिश करें।
सैय्यद शमीम अनवर संरक्षक, सईम एजुकेशनल ट्रस्ट

