मलबार परोटा मलबार से नहीं: केरल का सबसे पॉपुलर स्ट्रीट फूड मलबार परोटा (या केरल परोटा) नाम के बावजूद असल में मलबार क्षेत्र या केरल से उत्पन्न नहीं हुआ। इसकी परतों जितनी फ्लेकी (flaky) इसकी उत्पत्ति की कहानी भी है, जो भुखमरी, प्रवास और व्यापार से जुड़ी हुई है।
असली उत्पत्ति कहाँ से?
ज्यादातर ऐतिहासिक और खाद्य मानवशास्त्रीय स्रोतों के अनुसार, मलबार परोटा की जड़ें श्रीलंका के जाफना (Jaffna) क्षेत्र में हैं, जहाँ तमिल समुदाय में यह “वीचु परोटा” (Veechu Porotta) या “सीलोन परोटा” के नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश काल में भुखमरी और आर्थिक संकट के दौरान श्रीलंकाई तमिल मज़दूरों ने इसे तमिलनाडु के तटीय इलाकों (खासकर टूटिकोरिन) में लाया। वहीं से यह धीरे-धीरे केरल के मलबार क्षेत्र में फैला और लोकप्रिय हो गया।
केरल में यह पिछले 75-80 सालों में ही स्ट्रीट फूड के रूप में बहुत प्रसिद्ध हुआ। आज यह केरल से लेकर तमिलनाडु, मलेशिया, सिंगापुर और दुनिया के कई हिस्सों में उपलब्ध है।
अन्य सिद्धांत भी हैं
कुछ खाद्य इतिहासकारों (जैसे कुरुश दलाल) का मानना है कि परोटा की परतदार बनाने की तकनीक पश्चिम एशिया (खासकर यमन या अरब) से आई। अरब व्यापारियों ने प्राचीन काल में मलबार तट से व्यापार के दौरान ऐसी फ्लैटब्रेड (जैसे मलावाह) का प्रभाव डाला। यह उत्तर भारतीय लच्छा पराठे से अलग है — इसमें मैदा, तेल/घी और दूध का इस्तेमाल होता है, जबकि उत्तर भारत में आमतौर पर आटे का पराठा बनता है। केरल गेहूं उत्पादक राज्य नहीं है, इसलिए इसका विदेशी मूल साफ़ झलकता है।
आज की स्थिति
आज मलबार परोटा केरल की पहचान बन चुका है। इसे नूल परोटा, कोथु परोटा, चिल्ली परोटा जैसी कई वैरायटी में परोसा जाता है — खासकर बीफ फ्राई, चिकन करी या अंडे की भुर्जी के साथ। सड़क किनारे के होटलों से लेकर घरों तक यह हर किसी का फेवरेट है। फिर भी इसका नाम “मलबार परोटा” इसलिए पड़ा क्योंकि यह उत्तर केरल (मलबार) में सबसे पहले लोकप्रिय हुआ और वहीं से पूरे केरल में फैला। नाम भले ही मलबार का हो, लेकिन इसकी असली यात्रा श्रीलंका, तमिलनाडु और अरब व्यापार मार्गों से शुरू हुई। यह कहानी एक बार फिर याद दिलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप का खाना कितना मिश्रित, प्रवासी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का नतीजा है, परतों के नीचे छिपी स्वादिष्ट इतिहास की तरह!

