Harish Rana receives final farewell after euthanasia: 13 साल से कोमा में पड़े गाजियाबाद के 31-32 वर्षीय हरीश राणा का मंगलवार (24 मार्च) को शाम 4:10 बजे एम्स दिल्ली में निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारत में पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मिलने के बाद जीवन रक्षक उपकरण हटाए जाने के कुछ दिनों बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। बुधवार सुबह उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में किया गया, जहां परिवार और रिश्तेदारों की आंखें नम थीं।
पार्थिव शरीर सुबह करीब 8:30 बजे श्मशान पहुंचा। अंतिम विदाई के दौरान हरीश के पिता अशोक राणा भावुक हो गए। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों से अपील की कि कोई रोए नहीं, क्योंकि उनका बेटा अब पीड़ा से मुक्त होकर शांति से जा रहा है। कुछ परिजनों के मुंह से चीख निकल गई और पूरे श्मशान में सन्नाटा छा गया। परिवार के सदस्यों ने हरीश को अंतिम नमस्कार किया, जबकि ब्रह्माकुमारी बहनों ने भी भावुक विदाई दी।
परिवार ने दान किए अंग
अंतिम संस्कार से पहले परिवार ने हरीश के कॉर्निया और हार्ट वॉल्व दान कर दिए। यह उनका अंतिम उपहार था, जो दिखाता है कि हरीश की मौत के बाद भी वे दूसरों की जिंदगी रोशन करना चाहते थे।
क्या था पूरा मामला?
वर्ष 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग पढ़ते समय हरीश चौथी मंजिल से गिर गए थे। तब से वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (कोमा जैसी हालत) में थे। कोई सुधार की उम्मीद नहीं बची थी। परिवार ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पैसिव इच्छामृत्यु (लाइफ सपोर्ट हटाने) की अनुमति दी। इसके बाद हरीश को एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया, जहां धीरे-धीरे जीवन रक्षक उपकरण हटाए गए। पिता अशोक राणा ने पहले कहा था, “कोई मां-बाप अपने बच्चे की मौत नहीं चाहता, लेकिन हरीश के लिए मौत अब मुक्ति है।” उन्होंने फैसले को ‘गरिमापूर्ण मौत का अधिकार’ बताया था।
सामाजिक प्रभाव
हरीश राणा का मामला देश में ‘लाइविंग विल’ और ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ पर नई बहस छेड़ गया है। यह पहला ऐसा मामला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने बिना लिविंग विल के भी पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में रिश्तेदार, पड़ोसी और ब्रह्माकुमारी संगठन के सदस्य मौजूद थे। परिवार ने पूरे घटनाक्रम को शांतिपूर्ण और गरिमापूर्ण तरीके से संपन्न किया। हरीश राणा की 13 साल की लंबी पीड़ा आज खत्म हुई, लेकिन उनकी कहानी अब कई परिवारों के लिए उम्मीद और बहस का विषय बन गई है।
ओम शांति।

