सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों को स्थायी कमीशन (PC) देने में हो रहे व्यवस्थागत भेदभाव, मनमाने 250 अधिकारियों की कैप और अनुचित मूल्यांकन प्रक्रिया को खारिज करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पुरुष और महिला अधिकारियों को समान प्रशिक्षण और पोस्टिंग मिलने के बावजूद अलग-अलग मानदंड अपनाना संवैधानिक रूप से गलत है। यह फैसला आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की महिला SSC अधिकारियों के लंबे संघर्ष का नतीजा है।
2020 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों को कमांड भूमिकाओं सहित स्थायी कमीशन का अधिकार दिया था, लेकिन उसके बाद भी कई महिला अधिकारियों को PC नहीं मिल पाया। हाल के वर्षों में (2025 में) कोर्ट ने कई सुनवाइयों में आर्मी की ACR (Annual Confidential Reports) मूल्यांकन प्रक्रिया, ‘क्राइटेरिया अपॉइंटमेंट’ की गिनती और मेडिकल स्टैंडर्ड के रेट्रोस्पेक्टिव इस्तेमाल पर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि गलवान, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर जैसी मुश्किल पोस्टिंग्स में सेवा करने वाली महिलाओं के ACR को ‘नॉन-क्राइटेरिया’ मानकर पुरुषों से अलग तरीके से मूल्यांकन करना ‘आर्बिट्ररी’ (मनमाना) और लिंग भेदभावपूर्ण है।
सितंबर 2025 में जस्टिस सूर्यकांत, उज्जल भूयान और एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने 13 महिला आर्मी अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा था – “क्या पुरुष और महिला अधिकारियों के मूल्यांकन के लिए दो अलग फॉर्मेट हो सकते हैं? क्या यह लिंग आधारित दोहरे मानदंड नहीं है?” कोर्ट ने कहा कि दोनों लिंगों के अधिकारी समान प्रशिक्षण लेते हैं, फिर भेदभाव क्यों?
मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कोर्ट ने सभी सेवा कर रही महिला SSC अधिकारियों को राहत देते हुए कहा था कि उनका मॉरल गिराना ठीक नहीं है। कोर्ट ने स्टेटस-को बनाए रखने का आदेश दिया और उन्हें सेवा से नहीं हटाने को कहा। दिसंबर 2025 में एयर फोर्स की महिला अधिकारियों (विंग कमांडर सुचेता एडन समेत) की याचिका पर कोर्ट ने साफ कहा कि राष्ट्र को जमीन हो या आसमान, महिला अधिकारियों का योगदान समान रूप से मूल्यवान है। केंद्र सरकार ने भेदभाव से इनकार किया और दावा किया कि मूल्यांकन जेंडर न्यूट्रल है, लेकिन कोर्ट ने बार-बार आर्मी की नीति पर सवाल उठाए। 2025 में आर्मी में JAG ब्रांच में महिलाओं के लिए 50% सीटें तय करने और कॉमन मेरिट लिस्ट बनाने का भी कोर्ट ने समर्थन किया।
महत्वपूर्ण बिंदु:
250 अधिकारियों की वार्षिक कैप को चुनौती दी गई। ACR फ्रीज करने, क्राइटेरिया अपॉइंटमेंट न गिनने और पुराने मेडिकल स्टैंडर्ड लागू करने जैसी प्रथाओं को गलत ठहराया। कोर्ट ने निर्देश दिए कि सभी प्रभावित महिला अधिकारियों के मामले दोबारा विचार किए जाएं, समान मानदंड अपनाए जाएं और PC के साथ सीनियरिटी, प्रमोशन तथा मॉनेटरी बेनिफिट्स दिए जाएं। यह फैसला Article 14 (समानता का अधिकार) और Article 15 (लिंग भेदभाव निषेध) को मजबूत करता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ावा देगा, उनकी मोटिवेशन बढ़ाएगा और आधुनिक, समावेशी सेना बनाने में मदद करेगा। हालांकि, सेना की ऑपरेशनल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कार्यान्वयन पर नजर रखी जा रही है। यह फैसला 2020 के लैंडमार्क जजमेंट की भावना को आगे बढ़ाता है और साफ संदेश देता है कि सशस्त्र बलों में लिंग समानता अब विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक जरूरत है।
यह भी पढ़ें: Trump’s memes: ईरान का मेम्स-मिसाइल-कूटनीति का त्रिकोण, 5 दिन की सैन्य रोक

