Major changes in journalism after the Modi government: 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भारतीय पत्रकारिता में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कई वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि मुख्यधारा के न्यूज़ चैनलों पर संपादकीय स्वतंत्रता कम हो गई है जिसके कारण कॉर्पोरेट स्वामित्व बढ़ा और सरकारी दबाव या स्व-सेंसरशिप के कारण वे टीवी छोड़कर यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो गए। खासतौर पर एनडीटीवी और उसके हिंदी चैनल एनडीटीवी इंडिया के कई दिग्गज पत्रकारों ने यही रास्ता अपनाया। ताजा जानकारी के मुताबिक, 2025-26 में भी यह सिलसिला जारी है।
एनडीटीवी पर क्या हुआ?
2022 में गौतम अडानी ग्रुप ने एनडीटीवी पर होस्टाइल टेकओवर किया। फाउंडर्स प्रणॉय रॉय और राधिका रॉय ने बोर्ड से इस्तीफा दे दिया। इसके ठीक बाद रवीश कुमार (एनडीटीवी इंडिया के सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर) ने नवंबर 2022 में इस्तीफा दे दिया। उन्होंने यूट्यूब वीडियो में कहा, “आज का शाम वो शाम है जब पक्षी अपना घोंसला खो बैठा है क्योंकि किसी और ने छीन लिया।” रवीश ने अपना चैनल “Ravish Kumar Official” शुरू किया, जो आज 14 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स वाला है और लाखों लोग उनके विश्लेषण देखते हैं।
उसके बाद:
• श्रीनिवासन जैन, निधि रजदान, सुपर्णा सिंह जैसे कई सीनियर पत्रकारों ने छोड़ा।
• 2023 में मारिया शाकिल (एक्जीक्यूटिव एडिटर) ने भी इस्तीफा दिया।
• फरवरी 2026 में उमा सुधीर (27 साल की सेवा के बाद) रिटायर हो गईं।
• मार्च 2026 में शुभंकर मिश्रा (कंसल्टिंग एडिटर, एनडीटीवी इंडिया) ने इस्तीफा दे दिया। उनका यूट्यूब चैनल 78 लाख सब्सक्राइबर्स वाला है। जया कौशिक (15 साल की सेवा) ने एनडीटीवी छोड़कर अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू करने का फैसला किया। मई 2025 में राहुल कंवल (पूर्व इंडिया टुडे) को CEO और एडिटर-इन-चीफ बनाया गया। आलोचकों का कहना है कि चैनल का टोन अब ज्यादा “लाउड, कम्यूनली चार्ज्ड” हो गया है – डिबेट्स में “सम्विधान vs शरिया”, “हिंदू राष्ट्र vs शरिया” जैसे टॉपिक्स आम हैं। एनडीटीवी ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा कि वो “लीगेसी” को आगे बढ़ा रहा है। लेकिन चैनल अभी भी घाटे में है (2025 में 200 करोड़ से ज्यादा का नुकसान)।
क्यों मजबूर हो रहे हैं पत्रकार?
पत्रकारों और मीडिया वॉचडॉग्स के अनुसार मुख्य कारण:
1. कॉर्पोरेट स्वामित्व का बढ़ना: अडानी, अंबानी जैसे बड़े बिजनेसमैन (जो सरकार के करीबी माने जाते हैं) ने कई चैनल खरीदे। इससे संपादकीय नीति पर असर पड़ता है।
2. सरकारी दबाव के आरोप: सरकारी विज्ञापन, IT रेड, केस आदि का डर। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 150-161 रैंक के आसपास है (2022-26)।
3. टीआरपी और सनसनीखेज पत्रकारिता: गंभीर रिपोर्टिंग की जगह शोर-शराबे वाली डिबेट्स।
4. यूट्यूब की आजादी: यहां कोई मालिक नहीं, सीधे ऑडियंस से कनेक्ट। सुपरचैट, सदस्यता से कमाई। रवीश कुमार, अभिसार शर्मा जैसे कई ने लाखों-करोड़ों कमाए। रवीश कुमार ने कहा था, “आज मीडिया इकोसिस्टम को नष्ट कर दिया गया है।” कई युवा पत्रकार भी टीवी जॉब छोड़ यूट्यूब चुन रहे हैं क्योंकि वहां “सच्ची कहानी” बिना सेंसर के कह सकते हैं।
लेकिन सब कुछ काला नहीं
NDTV और अन्य चैनल कहते हैं कि स्वतंत्रता बरकरार है, बस “नए भारत” के हिसाब से अपडेट हो रहे हैं। सरकार का स्टैंड है कि मीडिया पूरी तरह आजाद है और आलोचना होती रहती है। यूट्यूब पर भी चुनौतियां हैं – कुछ चैनलों पर ब्लॉक, डिमोनेटाइजेशन या कॉपीराइट क्लेम्स लगे हैं।
निष्कर्ष: मोदी काल में पत्रकारिता का स्वरूप बदला है। टीवी से यूट्यूब का पलायन सिर्फ “मजबूरी” नहीं, बल्कि नई आजादी की तलाश भी है। एनडीटीवी इंडिया के सैकड़ों पूर्व कर्मचारी आज यूट्यूब पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। भविष्य में क्या होगा, यह देखना बाकी है – लेकिन दर्शक अब सीधे फैसला कर रहे हैं कि कौन सी खबर देखनी है।

