कॉर्पोरेट इंडिया में नेतृत्व का संकट
कॉर्पोरेट इंडिया में बूमर्स (50-60 वर्ष की आयु) अभी भी संस्थापक कुर्सियों और बोर्डों पर काबिज हैं, लेकिन मिलेनियल्स (30-45 वर्ष) मध्य और वरिष्ठ प्रबंधन की रीढ़ हैं, जो दबाव में जी रहे हैं। डेलॉयट के 2025 ग्लोबल जेन जी और मिलेनियल सर्वे के अनुसार, केवल 6% जेन जी सीनियर नेतृत्व को अपना मुख्य करियर लक्ष्य मानते हैं, जबकि 40% से अधिक मिलेनियल्स लगातार तनाव महसूस करते हैं।
लगभग आधे मिलेनियल्स को डर है कि एआई अगले 3-5 वर्षों में उनकी नौकरी छीन लेगा, खासकर आईटी, प्रोफेशनल सर्विसेज और बायोटेक सेक्टरों में। गैलप के डेटा से पता चलता है कि पुराने मिलेनियल्स (37-45 वर्ष) की भागीदारी जेन जी जितनी ही तेजी से गिर रही है, जो मध्य-करियर मैनेजर्स के रूप में कंपनियों के लिए बड़ा खतरा है।
जेन जी, जो महामारी, जलवायु चिंता और सोशल मीडिया से प्रभावित है, पदनामों से ज्यादा स्किल्स, प्रतिष्ठा से ज्यादा लचीलापन और स्थायित्व से ज्यादा उद्देश्य को प्राथमिकता देती है।भारत में जेन जी के बीच युवा बेरोजगारी 17% है, जो उन्हें पारंपरिक पदानुक्रम से दूर कर रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि पारंपरिक नेतृत्व मॉडल में विश्वास की कमी है, जहां लंबे घंटे, तनाव और जिम्मेदारी बिना स्वायत्तता के आती है। मैकिंसे की रिपोर्ट बताती है कि एआई अगले दशक में रूटीन कार्यों को बदल देगा, जिससे नेतृत्व पाइपलाइन छोटी हो जाएगी।
इसके विपरीत, शहरी भारत में ऐप्स जैसे अर्बन कंपनी का इंस्टाहेल्प, स्नैबिट और प्रॉंटो घरेलू सहायता को 10 मिनट में पहुंचा रहे हैं। ये ऐप्स सफाई, खाना बनाना और अन्य घरेलू कार्यों के लिए गिग वर्कर्स भेजते हैं, जो ग्राहकों को 50-100 रुपये प्रति घंटे की दर पर सुविधा देते हैं। स्नैबिट के ऑर्डर अगस्त 2025 में 1 लाख से बढ़कर फरवरी 2026 में 8.5 लाख हो गए, जबकि इंस्टाहेल्प ने 50,000 दैनिक बुकिंग्स पार की।
कार्यकर्ताओं, मुख्य रूप से महिलाओं, को 22,000-30,000 रुपये मासिक फिक्स्ड वेतन, बोनस, स्वास्थ्य बीमा और एसओएस फीचर मिलता है, जो पूर्णकालिक नौकरियों से बेहतर है। लेकिन अर्थशास्त्र संदिग्ध है: अर्बन कंपनी के इंस्टाहेल्प को Q3 FY26 में 61 करोड़ रुपये का EBITDA नुकसान हुआ।विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे लाभप्रदता पर फोकस बढ़ेगा, इंसेंटिव्स कम होंगे और कीमतें बढ़ेंगी, जैसा कैब और फूड डिलीवरी में हुआ।बाजार का आकार 30-40 अरब डॉलर का अनुमान है, लेकिन उच्च बर्न रेट्स और रिटेंशन चुनौतियां बनी हुई हैं।
दोनों का मेल: कार्य संस्कृति का बदलाव
ये दोनों रुझान एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं। जहां मिलेनियल्स बर्नआउट से थक चुके हैं, जेन जी गिग वर्क जैसे लचीले विकल्पों की ओर आकर्षित हो रही है, जो शुरुआती बेहतर कमाई प्रदान करते हैं। ग्रेट प्लेस टू वर्क की रिपोर्ट से पता चलता है कि आईटी कंपनियों में केवल 51% जेन जी सकारात्मक अनुभव रिपोर्ट करते हैं, जबकि महिलाओं में यह 47% है। क्या घरेलू सहायता ऐप्स जैसे प्लेटफॉर्म्स कॉर्पोरेट टैलेंट को खींच रहे हैं? 2026 में मेट्रो शहरों में मांग तीन गुना बढ़ी है, लेकिन स्थिरता सवालों के घेरे में है।
आगे की राह
कॉर्पोरेट इंडिया को एआई फ्लुएंसी, सहयोग और उद्देश्य-आधारित नेतृत्व की जरूरत है, जहां बूमर्स मेंटरिंग करें, मिलेनियल्स स्थिरता दें और जेन जी नवाचार लाए। वहीं, गिग इकोनॉमी को लाभप्रदता हासिल करनी होगी, वरना कार्यकर्ताओं की कमाई घट सकती है। भारत को इन चुनौतियों से निपटकर एक संतुलित कार्यबल बनाना होगा, जहां सुविधा और स्थिरता साथ चलें।

