नोएडा। वोल्वो, डबल डेकर और स्लीपर बसों में यात्रियों के साथ बड़ी मात्रा में सामान ढोने का खेल अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। टैक्स बचाने के लिए सामान भेजने वालों के लिए यात्री बसें कथित तौर पर आसान जरिया बनती जा रही हैं। बसों में यात्रियों के साथ लाखों रुपये का सामान लादकर उन्हें लंबी दूरी तक ले जाया जा रहा है। बसें जीएसटी चोरी करने वालों के लिए वरदान साबिति हो रही है। ऐसे में बसों में आग लगने या किसी हादसे की स्थिति में यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो जाता है।
यमुना एक्सप्रेसवे पर 24 सितंबर को हुए भीषण बस अग्निकांड में नौ यात्रियों की जिंदा जलकर मौत के बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आने से प्रशासन हरकत में आया। इसके बाद स्लीपर बसों की जांच और नियमों के पालन को लेकर बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया। लेकिन अभियान खत्म होने के कुछ ही दिन बाद नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर एक और डबल डेकर स्लीपर बस में आग लगने की घटना ने पूरी कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
28 से 30 सितंबर तक चला ऑपरेशन कवच 2.0
यमुना एक्सप्रेसवे हादसे के बाद प्रशासन की ओर से 28 से 30 सितंबर तक ‘ऑपरेशन कवच 2.0’ चलाया गया। इस दौरान स्लीपर बसों की सघन जांच की गई और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर कार्रवाई का दावा किया गया।
अभियान के दौरान बसों की फिटनेस, परमिट और सुरक्षा मानकों समेत विभिन्न बिंदुओं की जांच की गई। कार्रवाई के बाद उम्मीद थी कि एक्सप्रेसवे पर यात्रियों को लेकर चलने वाली स्लीपर बसों में नियमों का पालन सुनिश्चित होगा।
लेकिन अभियान खत्म होते ही हालात फिर पुराने नजर आने लगे।
ऑपरेशन खत्म होते ही एक्सप्रेसवे पर फिर धधकी बस
नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर एक और डबल डेकर स्लीपर बस में आग लगने की घटना ने सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बस में करीब 35 यात्री सवार थे, जबकि बड़ी मात्रा में सामान भी लदा हुआ बताया जा रहा है।
गनीमत रही कि चालक ने समय रहते सूझबूझ दिखाई और यात्रियों को बस से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। अगर आग तेजी से फैलती या यात्रियों को बाहर निकलने में कुछ मिनट की भी देरी होती तो यमुना एक्सप्रेसवे जैसी बड़ी त्रासदी दोबारा सामने आ सकती थी।
इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर हादसों के बाद ही प्रशासन क्यों जागता है और अभियान समाप्त होते ही नियमों की अनदेखी फिर कैसे शुरू हो जाती है?
यात्रियों के बीच सामान का अंबार, सुरक्षा से बड़ा टैक्स बचाने का खेल?
स्लीपर बसों में यात्रियों के साथ बड़ी मात्रा में सामान लादने का चलन लंबे समय से सवालों के घेरे में है। आरोप है कि सामान भेजने वाले लोग मालवाहक वाहनों के बजाय यात्री बसों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि इससे अलग से माल ढुलाई से जुड़े टैक्स और खर्च से बचने का रास्ता मिलता है।
लेकिन इस कथित टैक्स बचाने के खेल की कीमत यात्रियों को अपनी जान जोखिम में डालकर चुकानी पड़ सकती है। बस में यदि निर्धारित क्षमता से अधिक सामान रखा गया हो तो आपात स्थिति में यात्रियों को बाहर निकलने में भी परेशानी हो सकती है।
आग लगने, दुर्घटना होने या बस पलटने की स्थिति में सामान और यात्रियों की मौजूदगी राहत एवं बचाव कार्य को भी प्रभावित कर सकती है।
नौ मौतों के बाद भी सबक नहीं?
24 सितंबर को यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए बस अग्निकांड में नौ यात्रियों की मौत ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया था। हादसे के बाद न्यायपालिका के संज्ञान में आने पर प्रशासन ने स्लीपर बसों की जांच शुरू की और विशेष अभियान चलाया।
लेकिन अब नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर हुई दूसरी बस अग्निकांड की घटना ने कार्रवाई की स्थायी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल यह नहीं है कि हादसे के बाद कितने चालान काटे गए। असली सवाल यह है कि ऐसे वाहनों को सड़क पर उतरने से पहले ही नियमों के मुताबिक क्यों नहीं जांचा जाता?
सिर्फ चालान से नहीं रुकेगा बसों में सामान ढोने का खेल
बार-बार सामने आ रही घटनाओं से साफ है कि सिर्फ चालान काटना या कुछ दिनों का विशेष अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। परिवहन विभाग और पुलिस को ऐसे वाहनों की लगातार निगरानी करनी होगी।
विशेष रूप से लंबी दूरी की स्लीपर और डबल डेकर बसों में यह जांच जरूरी है कि बस में यात्रियों के अलावा कितना सामान ले जाया जा रहा है, सामान कहां रखा गया है, बस की फिटनेस कैसी है और आपात स्थिति में यात्रियों के सुरक्षित बाहर निकलने की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं।
अगर नियमों का उल्लंघन करने वाली बसें बार-बार सड़क पर लौट आती हैं तो सवाल कार्रवाई की संख्या पर नहीं, कार्रवाई की गंभीरता और स्थायी असर पर उठेंगे।
अभियान के बाद फिर वही तस्वीर, जिम्मेदार कौन?
ऑपरेशन कवच 2.0 के दौरान सघन जांच और कार्रवाई के दावे किए गए। लेकिन अभियान खत्म होने के कुछ ही समय बाद स्लीपर बस में आग लगना यह बताने के लिए काफी है कि अस्थायी अभियान और कागजी कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलने वाला।
यमुना एक्सप्रेसवे के हादसे में नौ लोगों की जान जा चुकी है। अब नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे की घटना में 35 यात्रियों की जान चालक की सूझबूझ से बच गई। ऐसे में अगली घटना का इंतजार करने के बजाय जिम्मेदार विभागों को यह सुनिश्चित करना होगा कि यात्री बसें टैक्स बचाने के लिए माल ढुलाई का जरिया न बनें और यात्रियों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता न हो।

