‘सतलुज’ बैन विवाद: जसवंत सिंह खालड़ा की बेटी नवकिरण का बड़ा बयान, फिल्म ‘सतलुज’ बैन विवाद और पिता की कस्टडी हत्या पर खुलकर बोलीं

‘सतलुज’ बैन विवाद: चंडीगढ़। पंजाब में सुरक्षाबलों द्वारा गैरकानूनी अंतिम संस्कार और जबरन गुमशुदगी के मामलों को उजागर करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर बनी बायोपिक ‘सतलुज’ (मूल नाम ‘पंजाब 95’) के OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से अचानक हटाए जाने के बाद यह मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। इसी बीच खालड़ा की बेटी नवकिरण कौर खालड़ा ने मीडिया से बातचीत में अपने पिता की विरासत, फिल्म विवाद और उस दौर की भयावह यादों को साझा किया।

“पिता का शरीर भी राज्य के लिए बहुत भारी साबित हुआ”

नवकिरण ने कहा कि उन्हें इस विवाद से हैरानी नहीं हुई, बल्कि फिल्म को रोकने की कोशिशों ने उनके पिता के काम में जनता की दिलचस्पी और बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि इतने सालों बाद भी उनके पिता की कहानी सत्ता तंत्र को बेचैन करती है, और 1995 से आज तक वह व्यवस्था को परेशान करते आए हैं।

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा

जब 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा को कथित तौर पर पंजाब पुलिस उनके घर से उठा ले गई थी, तब नवकिरण महज 10 साल की थीं और उनका छोटा भाई जनमीत केवल 8 साल का। खालड़ा उस दौर में पंजाब में हुई हजारों गुमशुदगियों और गैरकानूनी अंतिम संस्कारों पर शोध कर रहे थे। उनके शोध के मुताबिक राज्यभर में करीब 25,000 अज्ञात शवों का गुपचुप तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। हफ्तों तक प्रताड़ना के बाद पुलिस हिरासत में ही उनकी हत्या कर दी गई थी। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पांच पुलिसकर्मियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी। नवकिरण ने बताया कि उनके पिता घर पर भी अपने काम को लेकर खुलकर बात करते थे और अक्सर पत्रकारों, शोधकर्ताओं तथा लापता परिजनों की तलाश कर रहे परिवारों से मिलते थे। उनके गायब होने के बाद सैकड़ों लोग इंसाफ की उम्मीद में उनके घर पहुंचे थे।

फिल्म को लेकर क्या कहा

नवकिरण ने बताया कि फिल्म अदालती दस्तावेजों और प्रमाणित तथ्यों पर आधारित है, और उनका परिवार चाहता था कि इसे बिना किसी बड़े बदलाव के रिलीज किया जाए। अपने पिता को खालिस्तान आंदोलन से जोड़े जाने की आलोचनाओं पर उन्होंने स्पष्ट किया कि खालड़ा हमेशा संवैधानिक संस्थाओं के प्रति प्रतिबद्ध रहे और उन्होंने धर्म देखे बिना पीड़ितों के मामले दर्ज किए। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार ने कभी किसी राजनीतिक दल से समर्थन की उम्मीद नहीं की, और उनके लिए भाजपा, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल तथा आम आदमी पार्टी में कोई फर्क नहीं है।

कैसे हुआ पूरा विवाद

दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म शुक्रवार को ZEE5 पर रिलीज हुई थी, लेकिन रविवार रात इसे अचानक प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। सरकार की ओर से इस कदम को यह कहते हुए उचित ठहराया गया कि पंजाब चुनावों से पहले फिल्म का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थक आंदोलन को हवा देने के लिए किया जा सकता था। हालांकि पंजाब की राजनीति और अन्य प्रमुख हस्तियों ने इस तर्क को खारिज किया। शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इसे सेंसरशिप नहीं बल्कि सामूहिक स्मृति, सच्चाई और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। वहीं पंजाब के पूर्व एडवोकेट जनरल और जाने-माने आपराधिक वकील आर एस चीमा ने कहा कि खालड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था, जहां यह दर्ज हुआ कि वे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और कुछ पुलिस अधिकारियों ने उनकी हत्या की थी। फिल्म हटाए जाने के बावजूद पंजाब और जम्मू में गुरुद्वारों तथा सामुदायिक स्थलों पर ‘सतलुज’ की सार्वजनिक स्क्रीनिंग जारी है, जिसे किसी एक राजनीतिक झंडे के बिना अलग-अलग समूहों द्वारा आयोजित किया जा रहा है।

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