उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच नेताओं की आवाजाही एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। चुनाव नजदीक आते ही यह सवाल उठने लगा है कि कौन-सा नेता किस पार्टी में रहेगा। पिछले डेढ़ दशक के राजनीतिक रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रदेश की राजनीति में दलबदल एक बड़ा ट्रेंड बन चुका है। दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार…
399 विधायकों में 122 दलबदलू
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश विधानसभा के मौजूदा 399 विधायकों में करीब 122 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर में पार्टी बदली है। यानी लगभग 30 प्रतिशत विधायक किसी न किसी दल से होकर वर्तमान पार्टी तक पहुंचे हैं। यह आंकड़ा प्रदेश की बदलती राजनीतिक रणनीतियों और नेताओं की अवसरवादी राजनीति को दर्शाता है।
भाजपा में सबसे ज्यादा दूसरे दलों से आए विधायक
वर्तमान में भाजपा के पास सबसे अधिक ऐसे विधायक हैं जो पहले अन्य राजनीतिक दलों में रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायकों को शामिल करने पर भाजपा का संख्याबल 260 तक पहुंचता है। इनमें 78 विधायक दूसरे दलों से भाजपा में आए हैं, जो कुल संख्या का लगभग 30 प्रतिशत हैं।
सपा में भी बड़ी संख्या में दलबदलू नेता
समाजवादी पार्टी के 29 विधायक अन्य दलों से आकर पार्टी में शामिल हुए हैं। 2022 विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी छोड़कर कई नेता सपा में आए थे। इनमें से 5 नेता चुनाव जीतकर विधायक बने। 2024 लोकसभा चुनाव में भी दूसरे दलों से आए नेताओं ने सपा के प्रदर्शन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
बसपा को सबसे ज्यादा नुकसान
पिछले 15 वर्षों में सबसे ज्यादा राजनीतिक नुकसान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हुआ है। 2017 विधानसभा चुनाव से पहले ही बड़ी संख्या में उसके विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी। 2017 में बसपा के 19 विधायक जीतकर आए थे, लेकिन 2022 चुनाव तक उनमें से 15 विधायक दूसरी पार्टियों में चले गए। वर्तमान में बसपा के पास केवल एक विधायक बचा है।
सहयोगी दलों में भी दलबदल का असर
भाजपा की सहयोगी पार्टियों में भी दलबदल का प्रभाव साफ दिखाई देता है।
- निषाद पार्टी के लगभग 80% विधायक दूसरे दलों से आए हैं।
- सुभासपा के करीब 50% विधायक दलबदलू हैं।
- राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) में लगभग 33% विधायक दूसरे दलों से आए हैं।
- अपना दल (एस) के करीब 31% विधायक पहले अन्य पार्टियों में रह चुके हैं।
- कांग्रेस के वर्तमान विधायकों में भी लगभग 50% ऐसे हैं जिन्होंने पार्टी बदली है।
लोकसभा सांसदों में भी दलबदल का बड़ा असर
उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सांसदों में भी दलबदल का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी के 37 सांसदों में से 19 सांसद दूसरे दलों से होकर सपा में पहुंचे हैं, यानी लगभग 51 प्रतिशत सांसद दलबदलू हैं। भाजपा के 33 सांसदों में 15 सांसद पहले अन्य दलों में रह चुके हैं। यानी करीब 45 प्रतिशत सांसद दलबदल के बाद भाजपा तक पहुंचे हैं, जबकि 18 सांसद भाजपा के मूल कैडर से जुड़े माने जाते हैं। रालोद के 2 सांसदों में से एक सांसद दूसरे दल से आया है। वहीं कांग्रेस के 6 सांसदों में 3 सांसद ऐसे हैं जो पहले अन्य राजनीतिक दलों में रहे हैं। इनमें इमरान मसूद, राकेश राठौर और उज्ज्वल रमण सिंह शामिल हैं, जबकि राहुल गांधी, किशोरी लाल शर्मा और तनुज पुनिया लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं।
दारा सिंह चौहान का सबसे ज्यादा दलबदल
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री दारा सिंह चौहान उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने सबसे अधिक बार पार्टी बदली है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह अब तक पांच बार राजनीतिक दल बदल चुके हैं। यह उदाहरण बताता है कि प्रदेश की राजनीति में व्यक्तिगत राजनीतिक संभावनाओं के आधार पर दल बदलने की प्रवृत्ति लगातार बनी हुई है।
चुनावी समीकरण
2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलबदल एक बार फिर प्रमुख मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। पिछले 15 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि लगभग हर बड़े दल में दूसरे दलों से आए नेताओं की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। आने वाले महीनों में चुनावी समीकरण बदलने के साथ राजनीतिक दलों में नेताओं की नई आवाजाही भी देखने को मिल सकती है।

