नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिन्ह को फ्रीज करने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी की याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि पार्टी के दोनों धड़ों के बीच चल रहे विवाद को सुलझाने में उसे कितना समय लगेगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ज्योमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर तक के लिए टाल दी है।
क्या है पूरा मामला
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी करते हुए तृणमूल कांग्रेस के दोनों धड़ों को “ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” नाम और पार्टी के आरक्षित “फूल और घास” चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया था। आयोग ने कहा था कि विवाद का अंतिम निपटारा चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत अलग से किया जाएगा। अगले दिन यानी 18 सितंबर को आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों धड़ों को अस्थायी तौर पर नए नाम और चिन्ह आवंटित किए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को “ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” नाम और “फुटबॉल खिलाड़ी” चिन्ह मिला, जबकि रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विरोधी गुट को “डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस” नाम और “लिफाफा” चिन्ह दिया गया। यह व्यवस्था पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजिनगर सीटों पर 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए लागू होगी।
ममता ने अदालत का रुख क्यों किया
ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनाव आयोग के इस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। याचिका में चुनाव आयोग के साथ-साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी को भी प्रतिवादी बनाया गया है। आयोग के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ममता बनर्जी ने पार्टी की पहचान छिनने की तुलना मां से उसके बच्चे के बिछड़ने के दर्द से की थी और इसे देश के लोकतांत्रिक इतिहास का “काला दिन” करार दिया था। उन्होंने कहा था कि वे इस अंतरिम व्यवस्था को समझौते के तौर पर स्वीकार नहीं करेंगी और पार्टी की मूल पहचान व चिन्ह वापस पाने के लिए राजनीतिक, लोकतांत्रिक और कानूनी, हर स्तर पर लड़ाई लड़ेंगी।
विवाद की जड़ में क्या है
यह विवाद मई 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद पार्टी के भीतर गहराए मतभेदों से जुड़ा है। जून में 58 बागी विधायकों ने रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुना, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने ममता खेमे के उम्मीदवार को दरकिनार कर मान्यता दी। यह बगावत संसद तक भी पहुंची, जहां 20 लोकसभा सांसदों ने अलग गुट बनाकर भाजपा नीत NDA को समर्थन दिया। अब मामले की निगाहें 28 सितंबर की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो 6 अक्टूबर के उपचुनावों से ठीक पहले होगी।
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