सत्य निकेतन हादसे के बाद जागी MCD, लेकिन नोएडा के तंग गांवों में खड़ी बहुमंजिला PG इमारतें अब भी बड़े हादसे का इंतजार क्यों कर रही हैं?

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक पीजी (पेइंग गेस्ट) की इमारत भरभराकर गिरने से मची तबाही के बाद अब दिल्ली नगर निगम (MCD) के अधिकारी और कर्मचारी हरकत में आ गए हैं। शहर में अलग-अलग जगह चल रहे निर्माण कार्यों को रुकवाया जा रहा है, वहीं जो इमारतें पहले ही बन चुकी हैं, उनका स्ट्रक्चरल ऑडिट भी शुरू कर दिया गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल फिर से खड़ा कर दिया है — आखिर अवैध तरीके से इमारतें बनने ही क्यों दी जाती हैं, और हादसा होने के बाद ही प्रशासन क्यों जागता है?

सत्य निकेतन में क्या हुआ था?

दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के मोती बाग इलाके स्थित सत्य निकेतन में रविवार दोपहर करीब सवा एक बजे एक पांच मंजिला पीजी इमारत अचानक ढह गई। यह इमारत दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास स्थित थी, जहां बड़ी संख्या में छात्र किराए पर रहते हैं। हादसे में अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दस से ज्यादा लोगों को मलबे से सुरक्षित निकाला गया है। एनडीआरएफ, दिल्ली फायर सर्विस, दिल्ली पुलिस और डीडीएमए की टीमें लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटी रहीं। स्थानीय छात्रों के मुताबिक पुरानी आवासीय इमारतों को अवैध रूप से पीजी में बदल दिया गया था, जहां एक-एक मंजिल पर छोटे-छोटे कमरों में कई बेड लगाकर छात्रों को ठहराया जाता था। पुलिस जांच में सामने आया कि इमारत करीब 40-50 साल पुरानी थी और उसे PG के रूप में इस्तेमाल करने से पहले बेसमेंट में मरम्मत का काम भी कराया गया था।

हादसे के बाद हरकत में आया प्रशासन

घटना के बाद MCD ने दिल्ली में चार मंजिल से ऊंचे सभी अवैध निर्माणों को तुरंत सील करने का आदेश जारी किया है। दिल्ली के मेयर प्रवेश वाही ने कहा कि सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे के दोषियों को किसी भी हालत में नहीं बख्शा जाएगा, और अवैध निर्माण की अनुमति देने या उसे रोकने में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को तत्काल बर्खास्त किया जाएगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी पुरानी इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट की नई नीति लाने और जिम्मेदार अधिकारियों पर सस्पेंशन की कार्रवाई करने की बात कही है। इसके साथ ही MCD ने उसी गली में मौजूद कुछ अन्य जर्जर इमारतों को भी नोटिस जारी कर दिया है और मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश भी दिए गए हैं।

लेकिन सवाल यही है — क्या ये कार्रवाई सिर्फ हादसे के बाद की खानापूर्ति है, या वाकई अवैध निर्माण पर लगाम लगाने की स्थायी व्यवस्था बनेगी? दिल्ली में यह किसी से छिपा नहीं है कि घनी आबादी वाले इलाकों में सालों से बिना मंजूरी के मंजिलें बढ़ाई जाती रही हैं और स्थानीय निकाय के अधिकारी अक्सर आंखें मूंदे रहते हैं।

दिल्ली से सटे नोएडा में भी वैसा ही खतरा

दिल्ली की सीमा से सटे नोएडा में भी हालात बहुत अलग नहीं हैं। यहां के कई गांवों में तंग गलियों के बीच बड़ी-बड़ी बहुमंजिला पीजी इमारतें खड़ी कर दी गई हैं, जहां न तो पर्याप्त फायर सेफ्टी इंतजाम हैं और न ही निकासी के सुरक्षित रास्ते। ऐसे में यहां भी सत्य निकेतन जैसा हादसा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

ममूरा गांव में लग चुकी है आग, दो की हो चुकी है मौत

इसका ताजा उदाहरण नोएडा के सेक्टर-66 स्थित ममूरा गांव में देखने को मिला था, जहां एक बहुमंजिला पीजी इमारत में भीषण आग लग गई थी। आग एक इलेक्ट्रिक स्कूटर की बैटरी चार्ज करते समय शॉर्ट सर्किट होने से लगी थी, जिसमें धुएं में दम घुटने से दो लोगों की मौत हो गई थी। उस वक्त इमारत में करीब 48-50 परिवार फंसे हुए थे, जिन्हें फायर विभाग की टीमों ने बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर सुरक्षित बाहर निकाला। धुआं सीढ़ियों और लॉबी में भर जाने से लोगों में अफरा-तफरी मच गई थी और कई लोगों को पड़ोसी इमारतों की छतों से लकड़ी की सीढ़ियों के सहारे रेस्क्यू करना पड़ा था।

दो दिन का शोर, फिर सब कुछ भुला दिया गया

ममूरा हादसे के बाद दो-तीन दिन तक मीडिया और स्थानीय स्तर पर खूब हंगामा हुआ, प्रशासन की लापरवाही पर सवाल उठे, लेकिन उसके बाद प्राधिकरण और प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी सब कुछ भूल गए। न तो गांव की तंग गलियों में बनी अवैध और असुरक्षित इमारतों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई, न ही फायर सेफ्टी ऑडिट का कोई सिलसिला शुरू हुआ। नतीजा यह है कि आज भी नोएडा के कई गांवों में उसी तरह की घनी, असुरक्षित और नियमों को ताक पर रखकर बनाई गई इमारतें मौजूद हैं, जो किसी भी दिन बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं।

आखिर अवैध इमारतें बनने ही क्यों दी जाती हैं?

सत्य निकेतन और ममूरा जैसे मामले एक ही सवाल की ओर इशारा करते हैं — जब निर्माण के दौरान ही नियमों की अनदेखी साफ नजर आती है, तो स्थानीय निकाय के अधिकारी उसी वक्त कार्रवाई क्यों नहीं करते? जानकारों का मानना है कि निगरानी तंत्र की कमी, स्थानीय स्तर पर मिलीभगत और हादसे के बाद ही एक्टिव होने की प्रशासनिक प्रवृत्ति इसकी बड़ी वजहें हैं। जब तक निर्माण के समय ही सख्त निगरानी और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हादसे के बाद के ऑडिट और सीलिंग अभियान महज एक अस्थायी कार्रवाई बनकर रह जाएंगे, और दिल्ली-एनसीआर के घनी आबादी वाले इलाकों में इंसानी जान का खतरा बना रहेगा।

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