Partition 1947 Review: नई दिल्ली/मुंबई। आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई राजकुमार संतोषी की फिल्म बटवारा 1947 ने दर्शकों और समीक्षकों के बीच चर्चा तो जरूर छेड़ी है, लेकिन अपेक्षित इमोशनल इम्पैक्ट छोड़ने में नाकाम रही है। फिल्म का मूल विचार मजबूत है—अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ रह सकते हैं, एक-दूसरे के विश्वास की रक्षा कर सकते हैं—लेकिन फ्लैट परफॉर्मेंस, अचानक बदले रिश्ते और बनावटी सेट्स ने इसे निराश करने वाला अनुभव बना दिया।
कहानी आजादी के दिन से शुरू होती है। सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) एक ईमानदार मुस्लिम व्यक्ति हैं, जो नए राष्ट्र के जश्न में शामिल हैं। लेकिन बंटवारे की हिंसा उनके दरवाजे तक पहुंच जाती है। वे पाकिस्तान चले जाते हैं, जहां रिलीफ कैंप में घर की तलाश करते-करते उनकी मुलाकात हबीब (अली फजल) से होती है। हबीब उन्हें घर दिलवाते हैं, लेकिन वहां पहले से एक हिंदू महिला (शबाना आजमी) रह रही हैं। शुरू में परिवार उन्हें निकालने की कोशिश करता है, लेकिन धीरे-धीरे बंधन बनता है और सिकंदर दूसरी आस्था की महिला की रक्षा के लिए लड़ते नजर आते हैं।
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यही घर वाला रूपक है। यह उस भारत की याद दिलाता है जहां हिंदू-मुस्लिम साथ रह सकते हैं, त्योहार मना सकते हैं और एक-दूसरे के धर्म की रक्षा कर सकते हैं। कुरान के हवाले से भाईचारे और दूसरे धर्म के लोगों के पूजा के अधिकार पर बातें असरदार हैं। एक मौलवी का संवाद—“जुल्म को जुल्म से खत्म नहीं करते”—भी प्रासंगिक लगता है। दीवाली का सीक्वेंस और क्लाइमैक्स में सेकुलरिज्म व एकजुटता का संदेश आज के समय में जरूरी है। लेकिन कागज पर मजबूत यह कहानी स्क्रीन पर उतनी असरदार नहीं बन पाती। सबसे बड़ी कमजोरी सिकंदर के परिवार और शबाना आजमी के किरदार के बीच का रिश्ता है। शुरुआती नफरत अचानक स्नेह में बदल जाती है, बिना पर्याप्त बातचीत या छोटे-छोटे क्षणों के। रिश्ता दिखता है, महसूस नहीं होता। यही इमोशनल डिस्कनेक्ट पूरी फिल्म में बना रहता है।
सनी देओल सनी देओल ही हैं। जोरदार डायलॉग और एक के खिलाफ कई का मुकाबला उनके लिए जाना-पहचाना फॉर्मूला है। लेकिन यहां वे तारा सिंह जैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाते। अभिमन्यु सिंह का विलन किरदार कार्टूनिश लगती है। करण देओल का आर्क वादा दिखाता है, लेकिन पिता की स्क्रीन प्रेजेंस के आगे फीका पड़ जाता है। अली फजल शायर वाले अंदाज में ठीक-ठाक हैं। प्रीति जिंटा का दर्द चेहरे पर उतना नहीं उतरता। शबाना आजमी जैसी दिग्गज अभिनेत्री को भी लगातार उदास बुजुर्ग महिला तक सीमित कर दिया गया है।
सेट्स इतने बनावटी लगते हैं कि 1947 के माहौल में विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। एक डायलॉग तो बिल्कुल समकालीन लगता है, जहां बेटी पूछती है कि देश क्यों बंटा, तो मां कहती है—“अपने पापा से पूछो, क्योंकि ये सारे फैसले मर्द हमसे पूछे बिना लेते हैं।” यह ऐतिहासिक सेटिंग में फिट नहीं बैठता। कुल मिलाकर बटवारा 1947 टेक्स्ट के रूप में शानदार है। असगर वजाहत के नाटक *जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई* पर आधारित कहानी में विचार और बातचीत का वजन है। लेकिन सिनेमा को इमोशनल टेक्सचर, जीवंत रिश्ते और यकीन दिलाने वाली परफॉर्मेंस चाहिए। फिल्म सही बातें कहती है, लेकिन उन्हें महसूस कराने का तरीका नहीं जानती। नतीजा—एक संभावित भावुक कहानी हैरानी से ठंडी लगती है। समीक्षा उपलब्ध आलोचनात्मक फीडबैक पर आधारित। फिल्म 14 अगस्त 2026 को रिलीज हुई।

