मैगी-थम्स अप विवाद, भारत में सस्ते पैकेज्ड फूड पर निर्भरता की कहानी

लंदन/नई दिल्ली। भारत में खाद्य पदार्थों पर स्वास्थ्य चेतावनी लेबल लगाने की सरकारी योजना ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है, आख़िर भारत सस्ते पैकेज्ड फूड पर इतना निर्भर कैसे हो गया, जबकि वही कंपनियां दूसरे देशों में अपने उन्हीं ब्रांड्स के ज़्यादा पौष्टिक संस्करण बेचती हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, औसत भारतीय परिवार की आय वैश्विक औसत से काफ़ी कम होने के कारण नेस्ले की मैगी नूडल्स और कोका-कोला की थम्स अप जैसे सस्ते खाद्य उत्पाद यहां बेहद लोकप्रिय हैं। इससे बड़ी खाद्य कंपनियों को एक विशाल बाज़ार तो मिला, लेकिन उन मानकों को अपनाने का दबाव नहीं जो वे कई अन्य देशों में मानती हैं। अब यह स्थिति बदलने वाली है।

FSSAI का सख़्त क़दम, सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

उद्योग जगत को झटका देते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने गुरुवार को संकेत दिया कि वह चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की तय सीमा से ज़्यादा वाले उत्पादों पर सख़्त लाल रंग के वॉर्निंग लेबल एक ही चरण में लागू कर सकता है। यह फ़ैसला तब आया जब सुप्रीम कोर्ट के जजों ने प्राधिकरण की चरणबद्ध तरीक़े से लेबल लागू करने की मूल योजना पर सवाल उठाए।

गौरतलब है कि भारत में सामने-पैक चेतावनी लेबल को लेकर वर्षों से बहस चल रही है, जैसा चिली और मेक्सिको में लागू किया जा चुका है, लेकिन उद्योग जगत के विरोध के चलते यह अब तक टलता रहा। मार्च में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट सामने आई थी कि केंद्र सरकार ने कोका-कोला और नेस्ले-पेप्सिको का समर्थन करने वाले समूहों के दबाव में पैकेजिंग के सामने वाले हिस्से पर वॉर्निंग लेबल का प्रस्ताव टाल दिया था। इसी रिपोर्ट के बाद जनता में नाराज़गी बढ़ी, जिसका असर अब नियामक के रुख़ में दिख रहा है। ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन का कहना है कि प्रस्तावित नियम के तहत भारत के क़रीब 80 प्रतिशत पैकेज्ड फूड उत्पादों पर हाई फैट, शुगर या सॉल्ट का लेबल लग सकता है।

डायबिटीज़ का बढ़ता ख़तरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार भारत में अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि दुनिया भर के डायबिटीज़ मामलों में क़रीब एक-चौथाई हिस्सेदारी अकेले भारत की है। डेनिश दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने जुलाई में बताया था कि भारत में 10 करोड़ से ज़्यादा लोग डायबिटीज़ से और 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज़ की स्थिति से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञ इसका एक बड़ा कारण प्रोसेस्ड फूड को मानते हैं।

तेज़ी से बढ़ता पैकेज्ड फूड बाज़ार

रिसर्च फर्म IMARC ग्रुप के अनुमान के अनुसार भारत का पैकेज्ड फूड बाज़ार 2025 के 129.18 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 137.25 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और 2034 तक इसके 238.83 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारतीय घरों और सड़क किनारे हर साल जो क़रीब 6 अरब मील (भोजन) खाए जाते हैं, उनमें मैगी टू-मिनट मसाला नूडल्स की बड़ी हिस्सेदारी है, जिसे स्विस कंपनी नेस्ले बनाती है।

मैगी की शुरुआत और “अलग रेसिपी” का सवाल

नेस्ले ने 1983 में भारत में पहला इंस्टेंट नूडल्स ब्रांड मैगी लॉन्च किया था, जिसे कामकाजी माताओं और बच्चों को ध्यान में रखकर तेज़ शाम के नाश्ते के रूप में पेश किया गया। “मम्मी, भूख लगी है” जैसे विज्ञापनों ने इसे घर-घर पहुंचाया। इस सफलता ने भारत में नेस्ले की पकड़ मज़बूत की, जो आज कंपनी के लिए सबसे तेज़ी से बढ़ता बाज़ार है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बिकने वाली मैगी के सभी वैरिएंट पाम ऑयल में बनते हैं, जबकि ब्रिटेन में बिकने वाले कई संस्करणों में महंगे सूरजमुखी तेल का इस्तेमाल होता है। इसी तरह नेस्ले के किटकैट बार में भारत के मुक़ाबले ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले संस्करण में ज़्यादा कोको पाया जाता है।

यूनिलीवर के पूर्व मार्केटिंग मैनेजर शशांक मेहता ने रॉयटर्स से कहा कि यह मुद्दा राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़ा है — आख़िर कंपनियां यह फ़ैसला क्यों लेती हैं कि भारतीय उपभोक्ता बेहतर सामग्री वहन नहीं कर सकते। वहीं नेस्ले के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी (जिन्होंने नाम न बताने की शर्त पर बात की) के अनुसार बेहतर गुणवत्ता वाली सामग्री महंगी होती है और इससे क़ीमत-संवेदनशील बाज़ार में दाम बढ़ने का जोखिम रहता है। नेस्ले ने अपने बयान में कहा कि उसकी रेसिपी उपभोक्ताओं की अपेक्षाओं, स्थानीय स्वाद, सामग्री की उपलब्धता और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है, और रेसिपी में अंतर से उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होती। कंपनी ने यह भी कहा कि वह दुनिया भर में किटकैट की 10 से ज़्यादा क्षेत्रीय रेसिपी रखती है, भारत के सभी खाद्य सुरक्षा क़ानूनों का पालन करती है और पैकेट पर सामग्री स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

सौ साल पुरानी विरासत

पश्चिमी पैकेज्ड फूड कंपनियां क़रीब एक सदी से भारत में मौजूद हैं। नेस्ले ने 1912 में तत्कालीन ब्रिटिश उपनिवेश भारत में मीठा कंडेंस्ड मिल्क बेचना शुरू किया था, जब यहां की बड़ी आबादी बेहद ग़रीब थी। यूनिलीवर ने 1937 में हाइड्रोजनेटेड वनस्पति तेल “डालडा” बेचना शुरू किया, जो महंगे पारंपरिक घी का सस्ता विकल्प बनकर निम्न-मध्यम वर्गीय रसोई और मिठाई की दुकानों का हिस्सा बन गया। विदेशी कंपनियों ने क़ीमतें कम रखने के लिए जल्द ही स्थानीय उत्पादन शुरू कर दिया। मोंडेलेज़ इंडिया की पूर्व अधिकारी पारुल शर्मा, जो सुपरमार्केट बिक्री देखती थीं, ने कहा कि भारत के लिए कई रेसिपी दशकों पहले बेहद क़ीमत-सजग उपभोक्ता को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं और वही रेसिपी आगे भी चलती रहीं। उनके अनुसार लंबे समय तक भारतीय उपभोक्ताओं ने ब्रांड्स पर सवाल ही नहीं उठाए।

थम्स अप: स्वाद जिसने कंपनी को झुकाया

कोका-कोला का थम्स अप, जो दशकों में भारतीय स्वाद के हिसाब से ढला, आज एक अरब डॉलर से ज़्यादा का ब्रांड बन चुका है और भारत के साथ-साथ प्रवासी भारतीयों के बीच भी निर्यात होता है। दिखने में पेप्सी-कोक जैसा लेकिन स्वाद में अलग थम्स अप को कोका-कोला कंपनी ने 1993 में क़रीब 6 करोड़ डॉलर में ख़रीदा था, तब इरादा था कि इसे धीरे-धीरे बंद कर अपने फ्लैगशिप ड्रिंक से बदल दिया जाए। लेकिन भारतीय ग्राहकों की स्वाद-निष्ठा इतनी मज़बूत निकली कि कंपनी को यह ब्रांड बनाए रखना पड़ा। कोका-कोला का पारंपरिक कोला भी भारत में सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और सड़क किनारे मसाले डालकर “मसाला कोक” के रूप में बेचा जाता है। कोका-कोला ने इस रिपोर्ट पर टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया।

यूनिलीवर के प्रवक्ता ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में कंपनी ने अपने पूरे पोर्टफोलियो में चीनी और नमक कम करने में “उल्लेखनीय प्रगति” की है और वह विज्ञान-आधारित मानकों के तहत बेहतर पोषण के लिए दीर्घकालिक रूप से प्रतिबद्ध है। मोंडेलेज़ की पूर्व अधिकारी शर्मा के अनुसार, कंपनियों के लिए रेसिपी न बदलने की सबसे बड़ी वजह उपभोक्ताओं की स्वाद-निष्ठा है  रातों-रात रेसिपी बदलना वफ़ादार ग्राहक आधार खोने का जोखिम है।

आगे क्या

FSSAI के नए प्रस्ताव और सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार पैकेज्ड फूड कंपनियों पर स्वास्थ्य चेतावनी लेबल जैसे सख़्त नियम कितनी जल्दी और किस रूप में लागू करती है, और क्या इसका असर मैगी, थम्स अप, किटकैट जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स की रेसिपी या क़ीमतों पर पड़ेगा।

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