महंगाई की मार: नोएडा के होजरी कॉम्प्लेक्स में कर्मचारियों की हड़ताल, PAC तैनात दूसरे दिन भी जारी रहा प्रदर्शन

महंगाई की मार: गुरुग्राम के मानेसर के बाद अब नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में भी मजदूर वर्ग महंगाई और वेतन को लेकर सड़कों पर उतर आया है। फेज-2 के डी ब्लॉक में स्थित होजरी कॉम्प्लेक्स के कर्मचारियों ने बृहस्पतिवार को हड़ताल कर दी और सड़क पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिया।

क्या है असली वजह?

वैश्विक युद्ध के चलते बीते एक महीने से गैस किल्लत के कारण घर में खाना बनाना महंगा हो गया है। इसका असर रोजमर्रा के जरूरी उत्पादों से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक दिखने लगा है, जिसके चलते दूर-दराज से नोएडा आए कर्मचारियों के लिए यहाँ रहना बेहद कठिन हो गया है। एक महीने से अधिक समय तक इस समस्या से जूझने के बाद कर्मचारियों ने कंपनियों से वेतन बढ़ाने की मांग रख दी। जब वेतन नहीं बढ़ा, तो कर्मचारी सड़कों पर उतर आए।

कर्मचारियों का आरोप

कर्मचारी जितेंद्र कुमार ने बताया कि कंपनी की तरफ से गुरुग्राम, दिल्ली और हरियाणा में रहने वाले कर्मचारियों का वेतन बढ़ा दिया गया है, लेकिन नोएडा के कर्मचारियों के साथ यह भेदभाव किया जा रहा है। एक कर्मचारी राम स्वारथ ने कहा “गैस किल्लत से बिगड़ी स्थिति से महंगाई बढ़ गई है, ऐसे में कंपनियों को भी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाना चाहिए, ताकि वह नोएडा जैसे महंगे शहर में अपना गुजारा कर सकें।”

पुलिस तैनात, फिर भी नहीं माने

पुलिस अधिकारी कर्मचारियों को समझाने के लिए पहुंचे, लेकिन कर्मचारी वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हंगामा करते रहे।  भारी पुलिस बल और PAC की तैनाती के बावजूद प्रदर्शन जारी रहा। ACP उमेश यादव ने बताया कि काफी समझाने-बुझाने के प्रयास के बाद कर्मचारियों की हड़ताल खत्म कराई गई।

गुरुग्राम में भी यही हाल

गुरुग्राम के मानेसर में भी करीब 10 कंपनियों के कर्मचारी तहसील परिसर में हड़ताल पर बैठ गए थे। उनकी मुख्य मांग थी कि वेतन ₹10,000 से बढ़ाकर ₹20,000 किया जाए। महंगाई के इस दौर में इतनी कम सैलरी में गुजारा करना मुश्किल हो गया है।

श्रमिक संगठनों की माँग

सीटू के अध्यक्ष गंगेश्वर दत्त शर्मा ने कहा, “हम 12 फरवरी से नए संशोधित श्रम कानून खत्म करने और न्यूनतम वेतन 26,000 रुपये तक करने की मांग पर अडिग हैं, ताकि श्रमिक इस महंगाई में अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।” यह आंदोलन स्पष्ट संकेत दे रहा है कि वैश्विक संकट की आँच अब भारत के औद्योगिक मज़दूरों की थाली तक पहुँच चुकी है और अगर समय रहते नीतिगत हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो यह असंतोष और बड़े रूप में सामने आ सकता है।​​​​​​​​​​​​​​​​

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