नोएडा के गांवों में मौत का खतरा बने अवैध PG, 200 गज में सात मंजिल और 150 कमरे! दिल्ली हादसे के बाद भी नहीं जागा प्राधिकरण

नोएडा। दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी/हॉस्टल के रूप में इस्तेमाल हो रही बहुमंजिला इमारत के गिरने से हुई मौतों ने देशभर में अवैध और असुरक्षित इमारतों की पोल खोल दी है। दिल्ली सरकार ने हादसे के बाद अवैध पांच मंजिला इमारतों को सील करने और आसपास के पीजी व अन्य भवनों की जांच के निर्देश दिए हैं।

लेकिन नोएडा के गांवों में तस्वीर इससे अलग नहीं दिखाई देती। ममूरा, बरौला, सलारपुर, हाजीपुर, भंगेल, नयागांव, रायपुर, शाहदरा और गोवर्धनपुर समेत कई गांवों में छोटे-छोटे भूखंडों पर कई मंजिला इमारतें खड़ी कर उन्हें पीजी और किराये के कमरों में तब्दील किए जाने का आरोप है। संकरी गलियों और बेहद कम खुले स्थान के बीच बनी इन इमारतों में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर किसी दिन आग, भूकंप या भवन गिरने जैसी घटना हुई तो यहां रहने वाले लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का रास्ता क्या होगा?

200 गज के प्लॉट पर सात मंजिल, कमरों की भरमार

स्थानीय स्तर पर सामने आ रही तस्वीरों और शिकायतों के मुताबिक कुछ इलाकों में करीब 200 गज के भूखंड पर पांच से सात मंजिल तक निर्माण कराकर बड़ी संख्या में कमरे बनाए गए हैं। कई जगहों पर कमरे इतने छोटे हैं कि उन्हें ‘माचिस की डिब्बी’ जैसे कमरे कहा जा रहा है।

पीजी संचालकों के लिए इसका सीधा फायदा है—एक ही प्लॉट पर अधिक से अधिक कमरे और अधिक किराया। लेकिन इसका दूसरा पहलू उन छात्रों, नौकरीपेशा युवाओं और दूसरे शहरों से आने वाले लोगों की सुरक्षा है, जो कम किराये के कारण इन पीजी में रहने को मजबूर होते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन इमारतों का निर्माण स्वीकृत नक्शे के मुताबिक हुआ है? क्या इनकी संरचनात्मक मजबूती की किसी सक्षम इंजीनियर से जांच कराई गई है? क्या इनमें पर्याप्त निकासी मार्ग, सीढ़ियां और अग्निशमन व्यवस्था मौजूद है? और क्या संबंधित भवनों के पास वैध फायर सेफ्टी एनओसी है?

संकरी गलियां बन सकती हैं सबसे बड़ी मुसीबत

इन गांवों की सबसे बड़ी समस्या केवल भवनों की ऊंचाई नहीं है। कई जगह रास्ते बेहद संकरे हैं। अगर किसी बहुमंजिला पीजी में आग लगती है तो दमकल की गाड़ी का मौके तक पहुंचना भी चुनौती बन सकता है।

उत्तर प्रदेश पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर फायर सर्विस के लिए एनओसी की व्यवस्था उपलब्ध है। फायर सर्विस खुद बहुमंजिला इमारतों में निकासी मार्ग खुले रखने, नियमित फायर ड्रिल और आपातकालीन व्यवस्था पर जोर देती है।

ऐसे में नोएडा के गांवों में चल रहे पीजी का विशेष सर्वे कर यह देखना जरूरी हो जाता है कि कितनी इमारतों में वास्तविक रूप से ये व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

प्राधिकरण की जमीन पर भी निर्माण के आरोप

मामला केवल निजी भूखंडों पर बने भवनों तक सीमित नहीं है। नोएडा के कई गांवों में प्राधिकरण की अधिसूचित या अधिग्रहित जमीन पर अवैध कब्जे और निर्माण की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

जून 2026 में नोएडा प्राधिकरण ने सलारपुर, भंगेल और हाजीपुर में अधिसूचित जमीन पर अवैध कब्जे और निर्माण को लेकर सार्वजनिक चेतावनी जारी की थी। प्राधिकरण ने कहा था कि ऐसी जगहों पर ध्वस्तीकरण और सीलिंग की कार्रवाई की जा रही है तथा पुलिस में शिकायतें भी दी गई हैं।

इससे सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि सरकारी या प्राधिकरण की जमीन पर ही अवैध निर्माण खड़े हो रहे हैं तो निर्माण शुरू होने से पहले निगरानी व्यवस्था कहां थी?

‘ठेकेदार के भरोसे’ बहुमंजिला निर्माण का खेल?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई इमारतों का निर्माण विशेषज्ञ आर्किटेक्ट या स्ट्रक्चरल इंजीनियर की निगरानी के बजाय स्थानीय ठेकेदारों के भरोसे कराया जाता है। आरोप है कि जैसे-जैसे निर्माण आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे मंजिलें भी बढ़ती जाती हैं और अंत में सामान्य आवासीय मकान की जगह पूरी इमारत पीजी में बदल जाती है।

यदि किसी भवन की नींव, कॉलम, बीम और स्लैब की क्षमता निर्धारित मंजिलों के हिसाब से नहीं है, तो अतिरिक्त मंजिलें लोगों की जान के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि मकान बाहर से खड़ा है या नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक सुरक्षा का तकनीकी ऑडिट भी जरूरी है।

फायर विभाग हादसे के बाद ही जागेगा या पहले?

पीजी में आग लगने की स्थिति में शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन यदि इमारत में बड़ी संख्या में छोटे कमरे हों, गलियां संकरी हों, निकासी का एक ही रास्ता हो और सीढ़ियों पर सामान या अन्य अवरोध हों तो आग की स्थिति में भगदड़ और धुएं से बड़ा नुकसान हो सकता है।

उत्तर प्रदेश फायर सर्विस भी बहुमंजिला इमारतों में सुरक्षित निकासी, सीढ़ियों को प्राथमिक बचाव मार्ग बनाए रखने और आपातकालीन तैयारियों की आवश्यकता बताती है।

ऐसे में नोएडा के गांवों में चल रहे पीजी का फायर सेफ्टी ऑडिट केवल किसी घटना के बाद नहीं, बल्कि पहले से कराया जाना चाहिए।

वर्क सर्किल और जेई की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल

अवैध निर्माण को लेकर सबसे गंभीर सवाल निगरानी तंत्र पर उठता है। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जाते हैं कि निर्माण शुरू होने से लेकर कई मंजिल खड़ी होने तक संबंधित वर्क सर्किल के अधिकारियों और जेई को इसकी जानकारी रहती है।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी तय करने से पहले जांच जरूरी है। लेकिन यदि कोई इमारत महीनों तक बनती रहे, उसमें पांच-सात मंजिल तक निर्माण हो जाए और बाद में उसे पीजी के रूप में संचालित किया जाने लगे तो यह सवाल जरूर उठता है कि प्राधिकरण की फील्ड मॉनिटरिंग व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

नोएडा प्राधिकरण पहले भी गांवों में अवैध निर्माण के खिलाफ मुकदमे और कार्रवाई करता रहा है। उदाहरण के तौर पर नगला वाजिदपुर में बिना अनुमति निर्माण के मामले में आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कराया गया था।

पीजी में रहने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?

पीजी में रहने वाला व्यक्ति अक्सर किराये और लोकेशन को प्राथमिकता देता है। उसे यह जानकारी नहीं होती कि जिस कमरे में वह रह रहा है, उस कमरे के ऊपर बनी मंजिल कितनी सुरक्षित है या भवन का नक्शा स्वीकृत है अथवा नहीं।

यही वजह है कि नोएडा प्राधिकरण, जिला प्रशासन, अग्निशमन विभाग और पुलिस को मिलकर गांवों में चल रहे पीजी का संयुक्त सर्वे करना चाहिए।

सर्वे में कम से कम इन बिंदुओं की जांच होनी चाहिए—

  • भवन का स्वीकृत नक्शा और वास्तविक निर्माण।
  • कुल मंजिलों और भवन की ऊंचाई की जांच।
  • स्ट्रक्चरल सेफ्टी/स्थायित्व की तकनीकी जांच।
  • फायर सेफ्टी उपकरण और वैध एनओसी।
  • आपातकालीन निकासी मार्ग और सीढ़ियों की स्थिति।
  • संकरी गलियों में दमकल वाहन की पहुंच।
  • एक भवन में रहने वाले लोगों की वास्तविक संख्या।
  • बिजली के लोड और वायरिंग की सुरक्षा।
  • बेसमेंट या अतिरिक्त निर्माण की वैधता।
  • प्राधिकरण की जमीन या अधिसूचित भूमि पर कब्जे की स्थिति।

दिल्ली की कार्रवाई से नोएडा को भी लेना होगा सबक

सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने अवैध पांच मंजिला इमारतों को तत्काल सील करने के निर्देश दिए हैं और आसपास के पीजी व अन्य भवनों की जांच भी शुरू की गई है।

नोएडा में भी ऐसे हादसे का इंतजार करना बेहद खतरनाक होगा। यहां सवाल किसी एक पीजी या एक गांव का नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की सुरक्षा का है जो बेहतर रोजगार और कम किराये की तलाश में इन गांवों में बने कमरों और पीजी में रह रहे हैं।

जरूरत इस बात की है कि नोएडा प्राधिकरण केवल कागजों पर कार्रवाई न करे, बल्कि ममूरा, बरौला, सलारपुर, हाजीपुर, भंगेल, नयागांव, रायपुर और गोवर्धनपुर जैसे इलाकों में जमीन पर उतरकर बहुमंजिला इमारतों और पीजी का व्यापक सर्वे कराए। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि अवैध इमारत कब सील होगी। असली सवाल यह है कि अगर किसी रात इन इमारतों में आग लगी या कोई कमजोर भवन भरभराकर गिर गया तो उसमें रहने वाले लोगों को बचाने की तैयारी अभी कितनी है?

 

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