GBU छात्र को नोटिस देने वाले मजिस्ट्रेट सस्पेंड, सुप्रीम कोर्ट को सॉलिसिटर जनरल ने दी जानकारी

नई दिल्ली/ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) के छात्र अक्षत त्रिपाठी को 5 लाख रुपए के निजी मुचलके का नोटिस जारी करने वाले ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट-3 को निलंबित कर दिया गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को इस कार्रवाई की जानकारी दी। अक्षत ने BNSS की धारा 130 के तहत जारी इस नोटिस को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीवी दिनेश ने मामला CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने रखा और कहा कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया जाना जरूरी है।

नोटिस में क्या आरोप लगाए गए थे

पुलिस रिपोर्ट के आधार पर जारी नोटिस में अक्षत पर छात्रों में सरकार विरोधी और भ्रामक विचार फैलाने का आरोप लगाया गया था। यह भी कहा गया था कि वे छात्रों को “कॉकरोच जनता पार्टी” (CJP) के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, जिससे कैंपस में तनाव और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई गई। इसी आधार पर उनसे छह महीने के लिए 5 लाख रुपए का निजी मुचलका और समान राशि के दो जमानतदार पेश करने को कहा गया था।

सिर्फ एक दिन का मिला समय

याचिका के अनुसार 4 सितंबर को नोटिस जारी कर अगले ही दिन, यानी 5 सितंबर को पेश होने का निर्देश दिया गया। छात्र का कहना था कि इतने कम समय में न तो वकील तय कर पाना संभव था, न आरोपों को ठीक से समझना, और न ही 5-5 लाख रुपए की गारंटी वाले दो जमानतदारों का इंतजाम करना। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि जिस सामग्री के आधार पर नोटिस दिया गया, वह उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई और नोटिस में किसी ठोस घटना, तारीख या बयान का जिक्र नहीं था जिससे हिंसा की वास्तविक आशंका साबित हो सके।

पुराने आदेश और मौलिक अधिकारों का हवाला

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के उस आदेश का उल्लेख किया गया, जिसमें छात्र आंदोलनों से जुड़ी FIR रद्द करने और भविष्य में छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई न करने के निर्देश दिए गए थे। अक्षत ने तर्क दिया कि धरने में शामिल होने का आह्वान करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा के अधिकार) के दायरे में आता है। साथ ही उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी राशि का मुचलका मांगना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध जैसा है, और महज एक दिन में जवाब मांगना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

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