दिल्ली दंगा साजिश मामला: उमर खालिद की जमानत का संघर्ष जारी — सुप्रीम कोर्ट के अपने ही फैसले पर उठे सवाल

दिल्ली दंगा साजिश मामला: दिल्ली दंगा बड़ी साजिश मामले में पूर्व जेएनयू छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता उमर खालिद की जमानत का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने खुद अपने ही पिछले फैसले पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें खालिद की जमानत खारिज की गई थी।

पाँच साल से जेल में, अभी भी ट्रायल पूरा नहीं

उमर खालिद सितंबर 2020 से हिरासत में हैं और उन पर फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों की “बड़ी साजिश” रचने का आरोप है।  उन पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के साथ-साथ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत मुकदमा दर्ज है।

जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थी जमानत

सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2026 में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़े इस कथित “बड़ी साजिश” मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था।  हालाँकि, उसी मामले में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत मिल गई, जो पाँच साल से अधिक समय से जेल में थे।  कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को साजिश का “केंद्रीय और रचनात्मक” हिस्सा बताया था और दोनों की भूमिका को बाकी आरोपियों से “गुणात्मक रूप से अलग” करार दिया था।

रिव्यू याचिका भी हुई खारिज, अप्रैल 2026 में

जस्टिस अरविंद कुमार और एनवी अंजरिया की पीठ ने 16 अप्रैल के आदेश में रिव्यू याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिका में कोई दम नहीं है। खालिद ने सीनियर वकील कपिल सिब्बल के जरिए खुली अदालत में सुनवाई की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने वह अनुरोध भी ठुकरा दिया।

अब सुप्रीम कोर्ट ने ही उठाए अपने फैसले पर सवाल

ताज़ा घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि UAPA के मामलों में भी “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत लागू होता है और अदालत ने जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम को बेल देने से इनकार किया गया था। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने माना कि जब कोई बड़ी बेंच फैसला सुना दे, तो छोटी बेंच को उसे मानना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि आजकल ऐसा देखा जा रहा है कि छोटी बेंचें सीधे-सीधे मना तो नहीं करतीं, लेकिन घुमा-फिराकर बड़े फैसलों के असर को कमजोर कर देती हैं। बेंच ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में माना था कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालतें UAPA मामलों में जमानत दे सकती हैं, और खालिद की जमानत याचिका खारिज करते समय उस फैसले पर ध्यान नहीं दिया गया था।

आँकड़े भी बोलते हैं

2019 से 2023 के बीच पूरे भारत में UAPA मामलों में केवल 1.5% से 4% लोगों को सजा हुई — यानी लगभग 94% मामलों में बरी होने की संभावना होती है।  यह आँकड़ा UAPA के तहत लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रहने के सवाल को और गहरा करता है।

अब आगे क्या?

उमर खालिद के पास अब सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने का विकल्प है, हालाँकि उसकी सफलता की संभावना बेहद कम मानी जाती है।  इस बीच, न्यायमूर्ति नागरत्ना की पीठ की ताज़ा टिप्पणियाँ कानूनी जगत में एक नई बहस छेड़ गई हैं — क्या UAPA के नाम पर किसी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संवैधानिक है? यह मामला केवल उमर खालिद का नहीं, बल्कि भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जमानत के अधिकार और कठोर कानूनों के न्यायपूर्ण प्रयोग से जुड़े बुनियादी सवाल उठाता है।

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