ब्रिक्स का सफर: आरआईसी से ग्लोबल साउथ की आवाज बनने तक

History of BRICS

रूस-भारत-चीन की पहल से शुरू हुआ सफर, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद बना ब्रिक्स; अब बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मजबूत पैरवी कर रहा समूह

History of BRICS : सोवियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध का दौर खत्म हुआ और दुनिया तेजी से एकध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ी। अमेरिका की सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक ताकत बढ़ती गई। इसी दौर में दुनिया की उभरती शक्तियों के बीच ऐसी वैश्विक व्यवस्था की जरूरत महसूस होने लगी, जिसमें उनका प्रभाव और प्रतिनिधित्व अधिक हो। History of BRICS

रूस-भारत-चीन से हुई शुरुआत

इसी सोच के तहत 1998 में रूस के तत्कालीन नेता येवगेनी प्रिमाकोव ने भारत यात्रा के दौरान रूस, भारत और चीन के बीच त्रिपक्षीय सहयोग का विचार सामने रखा। आगे चलकर यही पहल आरआईसी के रूप में विकसित हुई। वर्ष 2002 से तीनों देशों के विदेश मंत्रियों की नियमित बैठकें शुरू हुईं और 2006 में सेंट पीटर्सबर्ग में तीनों देशों के शीर्ष नेता भी एक मंच पर आए।

इसके बाद ब्राजील के जुड़ने से आरआईसी का विस्तार ब्रिक के रूप में हुआ। 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव और ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा एक मंच पर आए।

दक्षिण अफ्रीका के आने से बना ब्रिक्स

वैश्विक वित्तीय संकट के दौर में ब्रिक ने खुद को उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद समूह का नाम ब्रिक्स हो गया। इसके बाद हर वर्ष शिखर सम्मेलन के जरिए आर्थिक सहयोग, विकास और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर चर्चा होती रही।

समय के साथ समूह का विस्तार भी हुआ। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों के जुड़ने से इसका दायरा और व्यापक हुआ। सदस्य देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापारिक मतभेद और रणनीतिक असहमति के बावजूद समूह ने संवाद का रास्ता बनाए रखा।

सैन्य गठबंधन नहीं, आर्थिक सहयोग पर जोर

ब्रिक्स ने कभी खुद को नाटो जैसे सैन्य गठबंधन के रूप में पेश नहीं किया। इसका मुख्य जोर विकास बैंक, आपसी व्यापार, निवेश और वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर रहा है। यही वजह है कि अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक हितों के बावजूद सदस्य देशों के बीच संवाद जारी रहा।

आज ब्रिक्स खुद को ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में स्थापित कर चुका है। समूह में 11 सदस्य और 10 साझेदार देश हैं। इसके अलावा कई अन्य देश भी संगठन से जुड़ने में रुचि दिखा रहे हैं। History of BRICS

दुनिया की अर्थव्यवस्था में बढ़ा प्रभाव

मौजूदा सदस्यता के आधार पर ब्रिक्स दुनिया की लगभग आधी आबादी और क्रय शक्ति समानता के आधार पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि ब्रिक्स का महत्व केवल इन आंकड़ों तक सीमित नहीं है।

इसका मूल उद्देश्य उन देशों को एक साझा मंच देना है, जिन्हें लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में उनकी आर्थिक और राजनीतिक क्षमता के मुकाबले कम प्रतिनिधित्व मिलने की शिकायत रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की संरचना उस समय बनी थी, जब दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां आज से काफी अलग थीं।

ब्रिक्स इसी असंतुलन में बदलाव की मांग को आगे बढ़ाने वाला मंच बन गया है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक सबसे बड़ी उपलब्धि

ब्रिक्स की यात्रा में वर्ष 2014 एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा, जब न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना का समझौता हुआ। 2015 में बैंक ने काम शुरू किया। इसका उद्देश्य विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे और सतत विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स की सबसे ठोस संस्थागत उपलब्धियों में शामिल है। भारत को भी इसके जरिए विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता मिलती है।

बैंक ने समय के साथ डॉलर के अलावा दूसरी मुद्राओं में वित्तपोषण की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और भुगतान को बढ़ावा देने की ब्रिक्स की चर्चा इसी व्यापक आर्थिक सोच का हिस्सा है।

डॉलर का विकल्प नहीं, निर्भरता कम करने की कोशिश

ब्रिक्स की ओर से यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि उसका उद्देश्य डॉलर को खत्म करना या तत्काल उसकी जगह कोई दूसरी मुद्रा लाना नहीं है। साझा ब्रिक्स मुद्रा की संभावना को लेकर भी संगठन ने कोई तत्काल पहल नहीं की है।

हालांकि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान बढ़ाने की कोशिशों को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विविधता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इसके जरिए सदस्य देश एकल मुद्रा और एक ही वित्तीय केंद्र पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश कर सकते हैं।

असली परीक्षा अभी बाकी

ब्रिक्स की सफलता के साथ उसकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। समूह के भीतर कई गंभीर अंतर्विरोध मौजूद हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है। रूस और पश्चिम के बीच संघर्ष ने वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है। ईरान और खाड़ी के कुछ देशों के बीच भी रणनीतिक मतभेद हैं।

इसके अलावा ब्रिक्स के कई देशों के बीच व्यापार में भारी असंतुलन है। चीन की आर्थिक ताकत समूह के अधिकांश अन्य देशों की तुलना में काफी बड़ी है। ऐसे में यह आशंका भी सामने आती रही है कि कहीं संगठन धीरे-धीरे चीन-केंद्रित व्यवस्था की ओर न बढ़ जाए।

अलग-अलग व्यवस्थाओं का साझा मंच

ब्रिक्स में लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दोनों तरह की राजनीतिक व्यवस्थाएं शामिल हैं। किसी की अर्थव्यवस्था ऊर्जा निर्यात पर आधारित है तो कोई विनिर्माण और घरेलू बाजार पर निर्भर है। सदस्य देशों के विदेश नीति हित भी हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं।

ब्रिक्स के पास यूरोपीय संघ जैसी साझा संधि, साझा बजट या स्थायी सचिवालय भी नहीं है। इसलिए इसे एक एकीकृत राजनीतिक या आर्थिक संघ के रूप में देखना सही नहीं होगा।

इसके बावजूद संगठन की सबसे बड़ी ताकत यही है कि अलग-अलग हितों और मतभेदों के बीच भी सदस्य देश संवाद का मंच बनाए रखने में सफल रहे हैं।

बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ता कदम

ब्रिक्स की वास्तविक ताकत शायद किसी साझा राजनीतिक एजेंडे से ज्यादा उस विचार में है, जिसमें दुनिया को एकध्रुवीय व्यवस्था से निकालकर अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय बनाने की कोशिश दिखाई देती है।

सदस्य देशों के बीच मतभेद भविष्य में भी बने रहेंगे, लेकिन वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, विकास के लिए वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था और आपसी आर्थिक सहयोग की जरूरत ब्रिक्स को प्रासंगिक बनाए रख सकती है। यही वजह है कि कई चुनौतियों के बावजूद ब्रिक्स का विस्तार जारी है और दुनिया के अनेक देश इसके साथ जुड़ने में रुचि दिखा रहे हैं।

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