दिल्ली के उत्तर-पूर्वी मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान मुस्लिम मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए बड़े पैमाने पर फॉर्म-7 दाखिल किए जाने का मामला सामने आया है। अंग्रेजी अखबार द हिंदू की विस्तृत खोजी रिपोर्टों में इस प्रक्रिया की जमीनी पड़ताल और डेटा विश्लेषण से कई गंभीर सवाल उठे हैं।
मुस्तफाबाद में क्या हुआ?
द हिंदू की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, मुस्तफाबाद में थर्ड पार्टी द्वारा दाखिल किए गए फॉर्म-7 में से अधिकांश भाजपा द्वारा नियुक्त बूथ लेवल एजेंट्स (BLA) के नाम पर थे। एक शुरुआती विश्लेषण में 843 आपत्तियों में से 597 थर्ड पार्टी वाली थीं, जिनमें से 96% में भाजपा BLA का नाम ऑब्जेक्टर के रूप में दर्ज था। इनमें से 572 आवेदन मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थे।
बाद की रिपोर्ट (नवंबर 2026) में कुल 1,021 डिलीशन आवेदनों में से कम से कम 787 (लगभग 77%) 20 भाजपा-नियुक्त BLA के नाम पर पाए गए। ये सभी आवेदन मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थे और इनमें “अनुपस्थित/स्थायी रूप से स्थानांतरित”, “पहले से नामांकित” या “मृत” जैसे कारण बताए गए थे।
द हिंदू के संवाददाताओं ने जमीनी स्तर पर जांच की। दयालपुर इलाके के पोलिंग पार्ट 129 में एक भाजपा BLA चंद्रशेखर नैनवाल के नाम पर 28 फॉर्म-7 दाखिल किए गए थे। इन सभी 28 मतदाताओं को संवाददाता ने अपने पंजीकृत पतों पर ही पाया। कई के पास वैध पहचान पत्र भी मौजूद थे। मतदाता साजिद हुसैन, जिनकी पत्नी अफसाना खातून और बेटे असद रजा जैदी के नाम हटाने के आवेदन थे, ने बताया कि वे दशकों से उसी पते पर रह रहे हैं और आवेदक का नाम कभी नहीं सुना।
एजेंटों का इनकार और नियमों का उल्लंघन
द हिंदू ने इन 20 भाजपा BLA से संपर्क किया। इनमें से 16 ने फॉर्म भरने या साइन करने से पूरी तरह इनकार कर दिया। कई ने कहा कि उनकी जानकारी के बिना उनके नाम का इस्तेमाल किया गया। एक एजेंट ने दावा किया कि उसने “500 से अधिक” फॉर्म भरे। कुछ एजेंटों ने भाजपा से अपना संबंध खत्म होने की बात कही।
निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार एक व्यक्ति अधिकतम 10 फॉर्म-7 दाखिल कर सकता है। BLA के लिए भी दैनिक सीमा और सत्यापन का वचनपत्र जरूरी है। फिर भी कई एजेंटों के नाम पर दर्जनों और कुछ मामलों में सैकड़ों आवेदन दर्ज पाए गए।
सॉफ्टवेयर में भी असमानता
द हिंदू के एक अलग डेटा विश्लेषण (अक्टूबर 2026) में पाया गया कि दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में मुस्लिम मतदाता करीब 13.6% हैं, लेकिन ERONET सॉफ्टवेयर द्वारा “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” (तार्किक विसंगति) के लिए चिह्नित किए गए लोगों में उनकी हिस्सेदारी 20.3% थी। परिवार के आकार से जुड़े कारणों में यह आंकड़ा 30% तक पहुंच गया। यानी मुस्लिम मतदाता गैर-मुस्लिमों की तुलना में लगभग 60% अधिक चिह्नित हो रहे थे।
अन्य राज्यों में भी आरोप
यह मामला अकेला नहीं है। कर्नाटक (बीदर) और तेलंगाना में भी विपक्षी दलों (CPI-M, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी) ने भाजपा से जुड़े लोगों पर मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थोक में प्री-फिल्ड फॉर्म-7 जमा करने के आरोप लगाए थे। पश्चिम बंगाल में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने दावा किया था कि हटाए गए नामों में 71% मुस्लिम और 51% महिलाएं थीं।
ताजा कार्रवाई
द हिंदू की रिपोर्ट के बाद मुस्तफाबाद के इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ने 7 नवंबर 2026 को पुलिस शिकायत दर्ज कराई है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिला चुनाव अधिकारी (DEO) अजय कुमार ने बताया कि स्वतंत्र सत्यापन में 37 फॉर्म में से 36 झूठे/जाली पाए गए। तीन “मृत” बताए गए मतदाता जीवित मिले। ERO ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत FIR की मांग की है। अन्य आवेदनों की जांच जारी है।
सुप्रीम कोर्ट में SIR मामले के याचिकाकर्ताओं (अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी) ने मुख्य चुनाव आयुक्त और दिल्ली CEO को पत्र लिखकर फर्जीवाड़े की जांच और FIR दर्ज करने की मांग की है। उन्होंने पूरे दिल्ली में फॉर्म-7 आवेदनों का व्यापक ऑडिट करने को कहा है।
चुनाव आयोग और दिल्ली CEO ने BLO को निर्देश दिए हैं कि हटाए गए नामों और दोबारा सत्यापन के दौरान मिलने वाले योग्य मतदाताओं का पूरा कारण दर्ज किया जाए ताकि मतदाता सूची की निष्पक्षता बनी रहे। हाल ही में ECI ने SIR से बाहर हुए मतदाताओं को दोबारा एनुमरेशन फॉर्म भरने का मौका भी दिया है।
यह पूरी कड़ी मतदाता सूची की शुद्धता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। प्रभावित मतदाताओं को सलाह दी जाती है कि वे अपने नाम की स्थिति जांचें और जरूरी दस्तावेज के साथ आपत्ति या दावा दाखिल करें।

