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ट्रंप-शी वाशिंगटन बैठक, बड़ी सफलता की बजाय व्यापार संघर्ष विराम बढ़ाने पर जोर ट्रंप-शी वाशिंगटन बैठक, बड़ी सफलता की बजाय व्यापार संघर्ष विराम बढ़ाने पर जोर

ट्रंप-शी वाशिंगटन बैठक, बड़ी सफलता की बजाय व्यापार संघर्ष विराम बढ़ाने पर जोर

बीजिंग/वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 24 सितंबर को वाशिंगटन में मुलाकात करेंगे। पिछली बैठक के चार महीने बाद हो रही इस मुलाकात से पहले हालात दोनों नेताओं के लिए अलग-अलग तरह से बदले हैं। जहां शी जिनपिंग के कार्यकाल में चीन के वैश्विक व्यापार में बड़ा उछाल देखा गया है, वहीं ट्रंप को घरेलू मोर्चे पर गिरती लोकप्रियता रेटिंग से जूझना पड़ रहा है।

विश्लेषकों के अनुसार इन बदलते हालातों ने इस शिखर वार्ता से बड़ी उम्मीदों को कम कर दिया है। शी जिनपिंग किसी तरह की रियायत देने की जल्दी में नहीं दिख रहे, जबकि ईरान के साथ महंगे युद्ध ने ट्रंप की लोकप्रियता और अमेरिकी जनता की जेब दोनों पर असर डाला है। हालांकि ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे भी सामने आ सकते हैं, लेकिन 24 सितंबर की बैठक का मुख्य केंद्र पिछले साल हुए व्यापार संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने पर रहेगा, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़े झटके से बचाया था। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के विदेश नीति विशेषज्ञ जॉन जिन, जो पहले अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में चीन डायरेक्टर रह चुके हैं, का कहना है कि शी जिनपिंग किसी ठोस नतीजे की तलाश में नहीं हैं, बल्कि वे ट्रंप के साथ बनी अनौपचारिक सहमति को बढ़ाना चाहते हैं ताकि चीन को खुद को मजबूत करने का समय मिल सके।

तैयारी बैठकें और सीमित उम्मीदें

व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने इस बैठक से बड़ी सफलताओं की संभावना को पहले ही कम आंका है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट और चीनी उप प्रधानमंत्री ही लीफेंग के बीच रविवार को न्यूयॉर्क में हुई प्रारंभिक वार्ता में एआई से जुड़े नियमों और गैर-संवेदनशील उत्पादों के व्यापार पर संभावित सहमति बनाने की कोशिश की गई। यह ट्रंप के 2025 में सत्ता संभालने के समय के उस वादे से काफी अलग है, जिसमें उन्होंने टैरिफ के जरिए चीन के साथ व्यापार असंतुलन को ठीक करने की बात कही थी।

चीन का निर्यात बूम बरकरार

अक्टूबर 2025 में शी के साथ संघर्ष विराम पर सहमति के बाद ट्रंप का ध्यान ईरान और यूक्रेन युद्ध, यूरोप के साथ मतभेद जैसे कई अन्य विदेश नीति मुद्दों पर बंट गया। दूसरी ओर, चीन को घरेलू मांग में सुस्ती और लंबे समय से चली आ रही प्रॉपर्टी संकट जैसी चुनौतियों के बावजूद उसका निर्यात क्षेत्र लगातार मजबूत बना हुआ है, जिसे अर्थशास्त्री अब “चाइना शॉक 2.0” कह रहे हैं। चीन का वैश्विक व्यापार अधिशेष लगातार दूसरे साल एक ट्रिलियन डॉलर के पार जाने की राह पर है।

अमेरिका ने शीन और टेमू जैसी ऑनलाइन रिटेल कंपनियों के सस्ते पार्सल पर लगाम लगाने में तो सफलता पाई है, लेकिन इस साल अमेरिका को निर्यात की जाने वाली करीब 6,500 उत्पाद श्रेणियों में से आधे से ज्यादा में 2025 की तुलना में बढ़ोतरी हुई है। शी के साथ वाशिंगटन जा रहे चीनी व्यापार प्रतिनिधिमंडल में कुछ ऐसी कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं, जो अमेरिकी नियामक जांच का सामना कर रही हैं। वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक सीएसआईएस के विशेषज्ञ स्कॉट कैनेडी के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने सोचा था कि भारी एकतरफा दबाव डालकर चीन को रियायतें देने पर मजबूर किया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनका कहना है कि अब यह शी जिनपिंग की दुनिया है, और बाकी सब उसी में जी रहे हैं।

ताइवान मुद्दे पर सहयोगी देशों की चिंता

अगर विश्लेषकों की मानें तो शी की मजबूत स्थिति ने एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों की चिंता बढ़ा दी है। उन्हें आशंका है कि शी, ट्रंप को ताइवान को लेकर अमेरिका के समर्थन में नरमी लाने के लिए राजी करने की कोशिश करेंगे। मई में बीजिंग में हुई मुलाकात के दौरान भी शी ने ट्रंप से ताइवान को हथियारों की बिक्री और द्वीप की रक्षा को लेकर अमेरिका के रुख पर सवाल पूछे थे, यह बात खुद ट्रंप ने पत्रकारों को बताई थी।

ट्रंप ने ताइवान के लिए प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को बीजिंग के साथ “सौदेबाजी का पत्ता” बताया है। ताइपे और टोक्यो के कुछ अधिकारियों को आशंका है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले, जो रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं, ट्रंप राजनीतिक फायदे के लिए इस पत्ते का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें चीन द्वारा बोइंग के विमान या कृषि उत्पाद खरीदने, या फेंटानिल के कच्चे रसायनों पर रोक लगाने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं, जिन्होंने अमेरिका में ओपिओइड संकट को बढ़ावा दिया है। शंघाई के फुदान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और चीन के विदेश मंत्रालय के सलाहकार वू शिनबो के अनुसार, अमेरिका-चीन संबंध अब पहले से कहीं ज्यादा लेन-देन पर आधारित हो गए हैं। उनका कहना है कि वाशिंगटन भले ही व्यापार वार्ता को प्राथमिकता देना चाहे, लेकिन बीजिंग के लिए ताइवान को लेकर अमेरिका का रुख सबसे अहम मुद्दा हो सकता है।

ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश

वाशिंगटन को उम्मीद है कि शी जिनपिंग ईरान पर दबाव बनाकर उस युद्ध को खत्म करने में मदद कर सकते हैं, जिसने ट्रंप की लोकप्रियता को उनके राजनीतिक करियर के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। हालांकि शी ने अब तक इस दिशा में कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। इस महीने की शुरुआत में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि बीजिंग प्रतिबंध से बचने की एक योजना के जरिए ईरान को अरबों डॉलर का सामान बेच रहा है, हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय ने ऐसी किसी योजना की जानकारी होने से इनकार किया है।

पिछले महीने अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर द्वितीयक प्रतिबंधों की धमकी दी थी, जिसे ट्रेजरी सचिव बेसेंट ने “आर्थिक डी-डे” करार दिया था, लेकिन अब तक यह धमकी ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन के खिलाफ अमल में नहीं लाई गई है। टोनी ब्लेयर इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज की वरिष्ठ भू-राजनीतिक शोधकर्ता रूबी ओसमैन के अनुसार, ट्रंप और शी दोनों ही आपसी संबंधों में स्थिरता बनाए रखना चाहते हैं ताकि वे अपनी-अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित कर सकें — ट्रंप के लिए यह प्राथमिकता ईरान है, जबकि शी के लिए ट्रंप के बाद की स्थिति के लिए चीन की घरेलू मजबूती।

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