कैंसर जैसी जानलेवा और गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिजनों के लिए इलाज का खर्च हमेशा से एक बड़ा मानसिक और आर्थिक बोझ रहा है। लेकिन जब जीवन रक्षक दवाओं के वास्तविक दाम और उन पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के बीच 10 गुना यानी 900% तक का भारी अंतर हो, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस सिस्टम का शिकार कौन हो रहा है? इसी बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने सख्त रुख अपनाते हुए कड़ी नाराजगी व्यक्त की है।
10 गुना अंतर पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दो अलग-अलग जनहित याचिकाओं पर सुनवाइयों के दौरान इस मामले से रूबरू हुई। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से आवश्यक और जीवन रक्षक दवाओं (Essential Medicines) की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण रखने और फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन में जारी बेलगाम मुनाफाखोरी को रोकने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष एक चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया गया:
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कैंसर दवा का खरीद मूल्य (Retailer Cost): लगभग ₹2,700
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दवा पर दर्ज अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP): ₹27,000
इस 900% से अधिक के भारी मुनाफाखोरी के आंकड़े को देखकर पीठ ने कड़े शब्दों में सवाल किया कि जब निर्माता (Manufacturer) या सप्लायर दुकानदार को दवा ₹2,700 में उपलब्ध करा रहा है, तो अंतिम चरण में मरीज से ₹27,000 जैसी भारी-भरकम राशि क्यों वसूली जा रही है?
“कैंसर के मरीज और उनके परिवार इलाज का खर्च उठाने के लिए अपने घर, जमीन और गहने तक बेचने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में आवश्यक दवाओं के दामों में इतना भारी अंतर मरीजों पर असहाय बोझ है। यह सीधे तौर पर दिनदहाड़े डकैती जैसा है।”
— सुप्रीम कोर्ट पीठ
दवाओं की सप्लाई चेन और MRP का खेल
आमतौर पर दवाओं के निर्माण से लेकर मरीज तक पहुंचने की प्रक्रिया में कई स्तर होते हैं:
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फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर (उत्पादक)
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सुपर स्टॉकइस्ट / डिस्ट्रीब्यूटर
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होलसेल एवं रिटेल केमिस्ट (दुकानदार)
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मरीज (उपभोक्ता)
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने इस बात को उजागर किया है कि कैसे MRP तय करने के मौजूदा नियमों का फायदा उठाकर सप्लाई चेन के बीच का कमीशन बेहद असामान्य स्तर तक बढ़ा दिया जाता है। दुकानदार या अस्पतालों के फार्मेसी विभाग को यह दवाएं बेहद कम दाम पर मिलती हैं, लेकिन वे मरीज से पूरी MRP वसूलते हैं, जिससे मरीजों का बजट पूरी तरह चरमरा जाता है।
क्या हैं इस मामले के मुख्य पहलू?
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अत्यधिक मुनाफाखोरी (Profiteering): दवाओं के वास्तविक लागत मूल्य और MRP के बीच का अनुचित अंतर।
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मरीजों का आर्थिक शोषण: जीवन रक्षक दवाओं की मजबूरी के कारण मरीज बिना मोलभाव किए MRP पर भुगतान करने को विवश होते हैं।
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दवा मूल्य नियंत्रण (DPCO) की समीक्षा: नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) द्वारा सभी जरूरी कैंसर दवाओं को प्राइस कैपिंग के दायरे में लाने की मांग।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले को ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिए जाने के बाद अब केंद्र सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय और फार्मास्युटिकल प्राइसिंग रेगुलेटर्स पर दबाव बढ़ गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद आवश्यक और गंभीर बीमारियों की दवाओं की ट्रेडेड मार्जिन (Trade Margin) को सीमित करने के लिए ठोस नीतिगत कदम उठाए जाएंगे, ताकि आम नागरिकों को सस्ती और पारदर्शी दरों पर जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध हो सकें।

