पटना, बिहार में अप्रैल 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी के दस साल पूरे होने के बाद राज्य एक नए और ज्यादा खतरनाक संकट से जूझ रहा है। शराब की तस्करी पर सख्ती के बीच म्यांमार से आने वाली ‘कोटा’ नाम की कच्ची हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों का बाजार तेजी से फैल रहा है। भारतीय एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार, NDPS अधिनियम के तहत दर्ज मामले 2019 में 697 थे, जो 2026 के पहले पांच महीनों में ही 1,905 हो गए—यह 2022 के पूरे साल के आंकड़े (1,822) से भी ज्यादा है। पुलिस आंकड़ों के मुताबिक, गोलियों की जब्ती 2022 में 29,762 से बढ़कर 2026 के जनवरी-मई में 9.29 लाख टुकड़ों तक पहुंच गई। गांजे की जब्ती भी लगभग दोगुनी हो गई—2022 में 16,692 किलो से 2025 में 31,915 किलो। हेरोइन की जब्ती 2025 में 65 किलो थी, जबकि 2026 के पहले पांच महीनों में ही 52 किलो से ज्यादा बरामद हुई। स्टेट टास्क फोर्स की नार्कोटिक्स सेल ने अक्टूबर 2026 तक 52 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत के ड्रग्स जब्त कर 315 लोगों को गिरफ्तार किया।
क्या है ‘कोटा’?
‘कोटा’ असल में कच्ची हेरोइन का एक रूप है। स्थानीय भाषा में ‘डोज़’ या ‘कोटा’ कहे जाने वाले इस पदार्थ को सिगरेट के साथ सूंघा जाता है। यह सरसों के दानों जैसा भुरभुरा, हल्का पीला या केसरिया सफेद दिखता है। म्यांमार से तैयार साबुन के डिब्बों में (10-12 ग्राम) भेजकर पूर्वोत्तर भारत (मिजोरम-मणिपुर सीमा) से असम के सिलचर रूट होकर बिहार लाया जाता है। एक डिब्बे की कीमत अब 50,000 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि छोटी शीशी 300-400 रुपये में बिकती है। यह ‘डेथ ट्रायंगल’ (म्यांमार, लाओस, थाईलैंड) से आ रहा है, जहां अब पारंपरिक अफीम के बजाय सिंथेटिक ड्रग्स और कच्ची हेरोइन का उत्पादन बढ़ गया है। बिहार की भूगोलिक स्थिति—नेपाल सीमा और पूर्वोत्तर से जुड़ाव—इसे ट्रांजिट और अब खपत का बाजार दोनों बना रही है।
शराबबंदी का उल्टा असर
शराब महंगी और दुर्लभ होने के बाद सस्ता और लंबे समय तक असर करने वाला नशा आकर्षक हो गया। कोविड लॉकडाउन के दौरान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर से लौटे प्रवासियों ने भी सिंथेटिक ड्रग्स का ज्ञान और संपर्क लाया। अब ग्रामीण क्षेत्रों—समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, रघुपुर—में भी यह फैल रहा है। किशोरों में NDPS मामले 2016-2023 में सिर्फ 11 थे, लेकिन 2024 में अकेले 50 हो गए। डी-एडिक्शन सेंटरों में लाभार्थियों की संख्या 2022-23 में 1,487 से 2024-25 में 29,429—लगभग 20 गुना—हो गई है, लेकिन सुविधाएं अभी भी अपर्याप्त हैं। बिहार पुलिस ने सितंबर 2025 में प्रोहिबिशन एंड स्टेट नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाया है। एसटीएफ की नार्कोटिक्स सेल सक्रिय है। पुलिस महानिदेशक कुंदन कृष्णन का कहना है कि सिर्फ पुलिस कार्रवाई काफी नहीं, समुदाय की भागीदारी जरूरी है। केंद्र सरकार के नशा मुक्त भारत अभियान का लक्ष्य 2029 रखा गया है। शराबबंदी के आंकड़ों के पीछे छिपा यह ड्रग्स का नया जाल बिहार की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।

