दशहरे (विजयदशमी) पर पूरे देश में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। आग की लपटें फूटती हैं, पटाखे फूटते हैं और जय श्री राम के नारे गूंजते हैं। यह दृश्य हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करता है। लेकिन सवाल उठता है—रावण आखिर कौन था? वह इतना महाज्ञानी, शिवभक्त और विद्वान होने के बावजूद आज क्यों जलाया जाता है? सीता का अपहरण करने के बाद भी उसने उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया, फिर भी दहन क्यों? और रामायण में कहीं भी रावण के पुतले दहन का जिक्र नहीं मिलता, तो यह परंपरा कहां से आई?
रावण कौन था?
रामायण के अनुसार रावण (दशानन) लंका का राजा था। वह ऋषि पुलस्त्य का पौत्र और ऋषि विश्रवा तथा राक्षसी कैकसी का पुत्र था। पिता ब्राह्मण और माता राक्षसी होने से वह ब्राह्मण-राक्षस कुल का था। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव को कई लोग उसकी जन्मभूमि मानते हैं। रावण दस सिर और बीस भुजाओं वाला बताया जाता है। वह वेद, शास्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष का प्रकांड पंडित था। शिव तांडव स्तोत्र उसी की रचना मानी जाती है। उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि देवता, दानव या राक्षस उसे नहीं मार सकेंगे—केवल मनुष्य ही मार सकेंगे। वह परम शिवभक्त था। कई मंदिरों में उसकी मूर्तियां शिव के साथ देखने को मिलती हैं। फिर भी रावण अहंकार, क्रोध, काम और अधर्म का प्रतीक बन गया। उसकी बहन शूर्पणखा का अपमान राम-लक्ष्मण द्वारा होने के बाद उसने बदला लेने के लिए सीता का अपहरण कर लिया। यही उसके पतन का मुख्य कारण बना।
सीता का अपहरण और सम्मान
रावण ने छल से साधु का वेश धरकर सीता का हरण किया और उन्हें लंका की अशोक वाटिका में रखा। वह बार-बार उन्हें रानी बनाने का प्रस्ताव देता रहा, धमकी भी दी, लेकिन कभी शारीरिक दुर्व्यवहार नहीं किया। रामायण और लोक मान्यताओं के अनुसार इसका कारण रंभा का शाप था। इससे पहले रावण ने अप्सरा रंभा (कुबेर के पुत्र की पत्नी) का अपमान किया था, जिस पर रंभा ने शाप दिया कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुएगा तो भस्म हो जाएगा। इसी कारण रावण ने सीता को छुआ तक नहीं। यह बात रावण के चरित्र की जटिलता को दर्शाती है—वह शक्तिशाली, विद्वान और कुछ हद तक मर्यादा का पालन करने वाला था, लेकिन अहंकार ने उसे अधर्म की राह पर धकेल दिया।
रावण दहन क्यों?
दशहरे का दिन भगवान राम द्वारा रावण के वध का दिन माना जाता है। यह बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। रावण के दस सिर को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार आदि दस अवगुणों का प्रतीक माना जाता है। पुतला जलाकर समाज अपने अंदर के इन अवगुणों को जलाने का संदेश देता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वाल्मीकि रामायण या अन्य प्रमुख रामायणों में रावण के पुतले दहन का कोई जिक्र नहीं मिलता। यह परंपरा आधुनिक है। इतिहासकारों के अनुसार आधुनिक रूप में पहला बड़ा रावण दहन 1948 में रांची (तब बिहार) में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने शुरू किया। दिल्ली में 1953 में पहली बार हुआ। 19वीं शताब्दी के बाद रामलीला के साथ विशाल पुतले जलाने की प्रथा बढ़ी। कुछ स्थानों पर दहन नहीं होता। बिसरख (जन्मभूमि) में रावण को ब्राह्मण और शिवभक्त मानकर यज्ञ-हवन होता है। देवघर (बैद्यनाथ धाम) में शिवभक्ति के कारण दहन नहीं होता। वहां मान्यता है कि रावण ने शिवलिंग लाने का प्रयास किया था।
मूत्र स्थान पर शिव जल अर्पण की मान्यता
झारखंड के देवघर बैद्यनाथ धाम के पास एक तालाब की लोककथा प्रचलित है कि वह रावण के मूत्र से बना। कथा के अनुसार रावण जब शिवलिंग लेकर जा रहा था तो यात्रा के दौरान जरूरत पड़ने पर उसने वहां मूत्र किया, जिससे तालाब बन गया। लोग उस तालाब का पानी इस्तेमाल नहीं करते। शिवलिंग पर जल अर्पण की सामान्य परंपरा शिव को प्रसन्न करने की है, जो रावण की भक्ति से जुड़ी मानी जाती है। यह दिखाता है कि भक्ति और अधर्म दोनों एक ही व्यक्ति में हो सकते हैं।
आज की प्रासंगिकता
2026 में दिल्ली के द्वारका में 221 फीट ऊंचा रावण का पुतला (दावा विश्व का सबसे ऊंचा) रिमोट कंट्रोल से जलाया जा रहा है। देशभर में तैयारियां जोरों पर हैं। लेकिन कुछ जगहों पर अभी भी रावण को सम्मान दिया जाता है—शिवभक्त, विद्वान और कभी-कभी पूर्वज के रूप में।रावण दहन सिर्फ एक त्योहार नहीं। यह याद दिलाता है कि ज्ञान, शक्ति और भक्ति होने के बावजूद अहंकार विनाश लाता है। सीता का सम्मान करने वाला रावण भी अधर्म का प्रतीक बन गया क्योंकि उसने मर्यादा तोड़ी। रामायण में पुतला दहन नहीं था, लेकिन परंपरा ने समाज को संदेश देने का माध्यम बना लिया। दशहरे पर जब पुतला जले, तो सिर्फ बाहर का रावण न जलाएं—अंदर के अहंकार, क्रोध और लोभ को भी जलाने का संकल्प लें। यही असली विजय है।
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