नई दिल्ली। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच चुनाव आयोग ने पिछले 24 घंटों में दो बड़े फैसले लिए हैं। आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए स्पेशल समरी रिविजन (SSR) की घोषणा की है। इसके साथ ही पहली बार राजनीतिक दलों को मतदाता सूची की पढ़ने योग्य (सर्चेबल) PDF सॉफ्ट कॉपी देने का भी ऐलान किया गया है। इसे आयोग के अपने लंबे समय से चले आ रहे रुख में बदलाव माना जा रहा है।
दोनों मुद्दे लंबे समय से विपक्ष, खासकर कांग्रेस, उठाती रही है। समय को भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और आयोग के खिलाफ विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन तेज हुए हैं। आरोप है कि SIR के तहत मतदाता सूचियों की देशव्यापी छंटनी में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम बाहर हो गए और भारी अव्यवस्था फैली।
क्या है SSR और SIR से कैसे अलग?
SIR के चलते आयोग ने नियमित SSR प्रक्रिया रोक रखी थी। इसी प्रक्रिया से 18 वर्ष के हो चुके नए मतदाता सूची में जुड़ते हैं। नतीजतन 2024-25 के SSR के बाद से युवा (Gen Z) मतदाता पंजीकरण नहीं करा पा रहे थे, जिस पर नाराजगी थी।
- SIR अधिक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज या पिछली मतदाता सूची से मिलान जरूरी होता है।
- SSR वार्षिक और नियमित प्रक्रिया है, जिसमें मतदाता सूची अपडेट होती है और नए पात्र मतदाता जोड़े जाते हैं। इसमें पुराने पुनरीक्षण से “मैपिंग” की जरूरत नहीं होती और BLO का घर-घर जाना भी नहीं होता।
आयोग की वेबसाइट के अनुसार, पिछला SSR 2024 में हुआ था। रिपोर्टों के मुताबिक SSR रोके जाने पर आयोग के भीतर भी असंतोष था। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने CEC ज्ञानेश कुमार से हर साल 18 वर्ष के होने वाले युवाओं को सूची में जोड़ने के लिए प्रक्रिया फिर शुरू करने का आग्रह किया था। SSR चुनावी तैयारी वाले उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत 17 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में होगा।
दलों को मिलेगी सॉफ्ट कॉपी
आयोग के आदेश के अनुसार सभी राजनीतिक दलों को हर मतदान केंद्र की ड्राफ्ट और अंतिम मतदाता सूची की पढ़ने योग्य PDF कॉपी दी जाएगी। अधिकारियों को नामों के जोड़, हटाने और संशोधन की सूची भी साझा करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि दल बदलावों पर नजर रख सकें। अब तक आयोग केवल “इमेज-ओनली” यानी स्कैन की हुई PDF देता था, जिसमें टेक्स्ट को चुना, खोजा या कॉपी नहीं किया जा सकता। नई व्यवस्था से दल मतदाता सूची को आसानी से खोज और विश्लेषित कर सकेंगे।
2018 से चला आ रहा विवाद
कांग्रेस ने यह मुद्दा पहली बार 2018 में उठाया था, जब कमलनाथ ने मध्य प्रदेश चुनाव से पहले फर्जी और दोहरी प्रविष्टियां पहचानने के लिए पढ़ने योग्य मतदाता सूची की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आयोग ने निजता और डेटा माइनिंग के खतरे का हवाला देकर विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की दलील का समर्थन करते हुए कहा था कि सूची किस प्रारूप में प्रकाशित हो, यह तय करना आयोग का काम है। 2025 में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने “वोट चोरी” अभियान के दौरान यह मांग फिर उठाई और आरोप लगाया कि जानबूझकर इमेज-ओनली PDF दी जाती हैं, ताकि संदिग्ध प्रविष्टियां खोजना मुश्किल हो। तब आयोग ने 2018 के फैसले का हवाला देकर कहा था कि मशीन-रीडेबल सूची जारी करना “वर्जित” है। एक साल बाद, SIR पर बढ़ती आलोचना के बीच, आयोग ने अब इस रुख में बदलाव किया है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम ने X पर लिखा, “प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार को सद्बुद्धि आई है।” उन्होंने कहा कि करोड़ों नाम अवैध रूप से हटाने के बाद अब “छूटे” मतदाताओं को जोड़ने की कवायद हो रही है, और दोहरे खर्च के लिए ज्ञानेश कुमार से वसूली होनी चाहिए। NCP (SP) विधायक जितेंद्र आव्हाड ने कहा कि बड़ा ड्रामा करने के बाद आयोग अब पढ़ने योग्य सॉफ्ट कॉपी देने पर राजी हुआ है। उन्होंने पूछा, “चुनाव आयोग क्या छिपाना चाहता था?” अब सवाल यह है कि क्या ये दोनों फैसले बढ़ते दबाव का नतीजा हैं, और क्या इनसे CEC के खिलाफ जारी विरोध शांत होगा। विपक्ष के इस मुद्दे को आगे भी उठाने की संभावना है।
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