प्रयागराज। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने गौतमबुद्ध नगर पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा- ‘इस राज्य में पुलिस की हालत बेहद खराब है, अधिकारी समझते हैं कुछ भी कर बच निकलेंगे’
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को नोएडा पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को एफआईआर दर्ज होने से पहले हिरासत में लेने और बाद में उसी मामले में गिरफ्तार दिखाने की प्रक्रिया को अवैध करार दिया। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने गौतमबुद्ध नगर निवासी दीपक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर कमिश्नरेट के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) और थाना फेज-II के एसएचओ से कड़ी नाराजगी जताते हुए मौखिक रूप से कहा- “आपको शर्म आनी चाहिए।” पीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस राज्य में पुलिस की हालत बेहद खराब है। अधिकारियों को लगता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और बच निकलेंगे।
क्या है पूरा मामला?
मामला 23 अगस्त 2026 का है। गौतमबुद्ध नगर में दो समूहों के बीच हिंसा की घटना हुई थी। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार दीपक समेत पांच लोगों को उसी दिन शाम 7:34 बजे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया।
इसके करीब दो घंटे बाद रात 9:39 बजे शिव राम शर्मा की लिखित रिपोर्ट पर थाना फेज-II में केस क्राइम नंबर 370 की एफआईआर दर्ज की गई। इस तरह रिकॉर्ड के अनुसार दीपक एफआईआर दर्ज होने से पहले ही पुलिस हिरासत में थे। बाद में पुलिस हिरासत में रहते हुए ही उन्हें उसी एफआईआर में औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया। याचिका में कहा गया कि एफआईआर में कई लोगों के नाम थे, लेकिन दीपक का नाम नहीं था और उन्हें कोई स्पष्ट भूमिका भी नहीं सौंपी गई थी।
नोटिस और प्रक्रिया में गंभीर खामियां
कोर्ट ने पाया कि बीएनएसएस की धारा 130 के तहत नोटिस 24 अगस्त को जारी किया गया, जबकि दीपक को एक दिन पहले ही हिरासत में ले लिया गया था। पीठ ने सवाल उठाया कि जिस नोटिस को धारा 126 और 170 के तहत हिरासत में लेने से पहले जारी किया जाना चाहिए था, वह हिरासत के बाद कैसे जारी किया गया।
अदालत ने एसीपी-1 को पूरी कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान गिरफ्तारी मेमो की तारीख, जमानत बांड की प्रक्रिया, गिरफ्तार व्यक्ति को वकील से मिलने का अधिकार न बताए जाने और जमानत राशि का रिकॉर्ड न होने जैसी कई प्रक्रियात्मक खामियां सामने आईं। याचिका में आरोप था कि 24 अगस्त की गिरफ्तारी दर्ज करने वाले मेमो पर 23 अगस्त की तारीख और हस्ताक्षर थे। 24 अगस्त को रिहाई का आदेश होने के बावजूद दीपक को शारीरिक रूप से रिहा नहीं किया गया और बाद में उन्हें उसी केस में गिरफ्तार दिखा दिया गया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद में रिमांड आदेश पारित हो जाने मात्र से पहले की अवैध हिरासत और गिरफ्तारी वैध नहीं हो जाती। पूरे घटनाक्रम और पुलिस रिकॉर्ड में आई खामियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दीपक की हिरासत को गैरकानूनी माना और याचिका स्वीकार कर ली। यह फैसला पुलिस की हिरासत और गिरफ्तारी प्रक्रिया में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने पर अदालत की सख्ती को दर्शाता है।
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